बालकाण्ड

अध्याय 275: उठा फरसा और विश्वामित्र की विनती

5 श्लोक · 275 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

उठा फरसा और विश्वामित्र की विनती

लक्ष्मण कहते हैं: आप तो बार बार काल को हाँक लगाकर मेरे लिए बुला रहे हैं। यह सुनकर परशुराम ने भयानक फरसा सँभाला। बोले: अब लोग मुझे दोष न दें, कड़वा बोलने वाला यह बालक वध योग्य है। बालक जानकर बहुत बचाया, अब यह सचमुच मरने वाला है। विश्वामित्र कहते हैं कि अपराध क्षमा कीजिए, साधु बालक के गुण दोष नहीं गिनते। परशुराम कहते हैं: हाथ में फरसा है, मैं निर्दय और क्रोधी हूँ, सामने गुरुद्रोही अपराधी है; फिर भी केवल कौशिक के शील के कारण इसे बिना मारे छोड़ता हूँ, नहीं तो थोड़े ही श्रम में गुरु के ऋण से उऋण हो जाता। विश्वामित्र मन में हँसे: मुनि को हरा ही हरा सूझता है; ये लोहे की खाँड़ हैं, गन्ने की नहीं।

275.1

तुम्ह तौ काल हाँक जनु लावा । बार बार मोहि लागि बोलावा ॥
सुनत लखन के बचन कठोरा । परसु सुधारि धरेउ कर घोरा ॥

tumha tau kāla hām̐ka janu lāvā | bāra bāra mohi lāgi bolāvā ||
sunata lakhana ke bacana kaṭhorā | parasu sudhāri dhareu kara ghorā ||

275.2

अब जनि देइ दोष मोहि लोगू । कटुबादी बालक बध जोगू ॥
बाल बिलोकि बहुत मैं बाँचा । अब यह मरनिहार भा साँचा ॥

aba jani dei doṣa mohi logū | kaṭubādī bālaka badha jogū ||
bāla biloki bahuta maiṃ bām̐cā | aba yaha maranihāra bhā sām̐cā ||

275.3

कौसिक कहा छमिअ अपराधू । बाल दोष-गुन गनहिँ न साधू ॥
कर कुठार मैं अकरुन-कोही । आगें अपराधी गुरु-द्रोही ॥

kausika kahā chamia aparādhū | bāla doṣa-guna ganahim̐ na sādhū ||
kara kuṭhāra maiṃ akaruna-kohī | āgeṃ aparādhī guru-drohī ||

275.4

उतर देत छोड़उँ बिनु मारें । केवल कौसिक सील तुम्हारें ॥
न त एहि काटि कुठार कठोरें । गुरुहि उरिन होतेउँ श्रम थोरें ॥

utara deta chor̤aum̐ binu māreṃ | kevala kausika sīla tumhāreṃ ||
na ta ehi kāṭi kuṭhāra kaṭhoreṃ | guruhi urina hoteum̐ śrama thoreṃ ||

दो॰ 275दोहा

गाधि-सूनु कह हृदयँ हँसि, मुनिहि हरिअरइ सूझ ।
अय-मय-खाँड़ न ऊख-मय, अजहुँ न बूझ अबूझ ॥

gādhi-sūnu kaha hṛdayam̐ ham̐si, munihi hariarai sūjha |
aya-maya-khām̐r̤a na ūkha-maya, ajahum̐ na būjha abūjha ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0