बालकाण्ड

अध्याय 270: टूटे धनुष पर परशुराम का क्रोध

5 श्लोक · 270 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

टूटे धनुष पर परशुराम का क्रोध

जनक ने बताया कि सब राजा किस कारण आए हैं। यह सुनकर परशुराम ने इधर उधर देखा और धरती पर पड़े धनुष के टुकड़े देखे। अत्यंत क्रोध से वे बोले, रे मूर्ख जनक, बता, धनुष किसने तोड़ा। उसे जल्दी दिखा, नहीं तो आज जहाँ तक तेरा राज्य है, वहाँ तक पृथ्वी उलट दूँगा। डर के मारे राजा उत्तर नहीं देते और कुटिल राजा मन में हर्षित होते हैं। देवता, मुनि, नाग और नगर के लोग सब भय से भरे हैं। सीता की माता पछताती हैं कि विधाता ने सारी बात बिगाड़ दी, और सीता को आधा पल कल्प जैसा लगने लगा। सबको भयभीत देखकर और जानकी का डर जानकर श्रीरघुवीर बोले, उनके हृदय में न हर्ष था न विषाद।

270.1

समाचार कहि जनक सुनाये । जेहि कारन महीप सब आये ॥
सुनत बचन फिरि अनत निहारे । देखे चाँप-खंड महि डारे ॥

samācāra kahi janaka sunāye | jehi kārana mahīpa saba āye ||
sunata bacana phiri anata nihāre | dekhe cām̐pa-khaṃḍa mahi ḍāre ||

270.2

अति रिस बोले बचन कठोरा । कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा ॥
बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू । उलटउँ महि जहँ लगि तव राजू ॥

ati risa bole bacana kaṭhorā | kahu jar̤a janaka dhanuṣa kai torā ||
begi dekhāu mūr̤ha na ta ājū | ulaṭaum̐ mahi jaham̐ lagi tava rājū ||

270.3

अति डर उतर देत नृप नाहीं । कुटिल भूप हरषे मन माहीं ॥
सुर मुनि नाग नगर नर-नारी । सोचहिँ सकल त्रास उर भारी ॥

ati ḍara utara deta nṛpa nāhīṃ | kuṭila bhūpa haraṣe mana māhīṃ ||
sura muni nāga nagara nara-nārī | socahim̐ sakala trāsa ura bhārī ||

270.4

मन पछिताति सीय-महँतारी । बिधि अब सबरी बात बिगारी ॥
भृगुपति कर सुभाउ सुनि सीता । अरध-निमेष कलप सम बीता ॥

mana pachitāti sīya-maham̐tārī | bidhi aba sabarī bāta bigārī ||
bhṛgupati kara subhāu suni sītā | aradha-nimeṣa kalapa sama bītā ||

दो॰ 270दोहा

सभय बिलोके लोग सब, जानि जानकी भीर ।
हृदयँ न हरष बिषाद कछु, बोले श्रीरघुबीर ॥

sabhaya biloke loga saba, jāni jānakī bhīra |
hṛdayam̐ na haraṣa biṣāda kachu, bole śrīraghubīra ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0