देखत भृगुपति बेषु कराला । उठे सकल भय-विकल भुआला ॥
पितु समेत कहि कहि निज नामा । लगे करन सब दंड-प्रनामा ॥
dekhata bhṛgupati beṣu karālā | uṭhe sakala bhaya-vikala bhuālā ||
pitu sameta kahi kahi nija nāmā | lage karana saba daṃḍa-pranāmā ||
5 श्लोक · 269 में से 361
भृगुपति का भयानक वेष देखकर सब राजा डरकर उठ खड़े हुए और पिता सहित अपना नाम ले लेकर दंडवत करने लगे। जिसे वे हित से देखते, वह भी समझता कि आयु पूरी हो गई। जनक ने सिर नवाया और सीता से प्रणाम करवाया, परशुराम ने आशीर्वाद दिया और सखियाँ उन्हें ले गईं। विश्वामित्र ने आकर दोनों भाइयों को उनके चरणों में डाला और कहा, ये दशरथ के पुत्र राम और लक्ष्मण हैं। अच्छी जोड़ी देखकर परशुराम ने आशीर्वाद दिया और कामदेव का मद छुड़ाने वाले श्रीराम के रूप पर उनके नेत्र ठहर गए। फिर विदेह से पूछा, इतनी भीड़ क्यों है। जानते हुए भी अनजान की तरह पूछते हैं, और शरीर में क्रोध छा गया।
देखत भृगुपति बेषु कराला । उठे सकल भय-विकल भुआला ॥
पितु समेत कहि कहि निज नामा । लगे करन सब दंड-प्रनामा ॥
dekhata bhṛgupati beṣu karālā | uṭhe sakala bhaya-vikala bhuālā ||
pitu sameta kahi kahi nija nāmā | lage karana saba daṃḍa-pranāmā ||
जेहि सुभायँ चितवहिँ हित जानी । सो जानइ जनु आइ खुटानी ॥
जनक बहोरि आइ सिर नावा । सीय बोलाइ प्रनाम करावा ॥
jehi subhāyam̐ citavahim̐ hita jānī | so jānai janu āi khuṭānī ||
janaka bahori āi sira nāvā | sīya bolāi pranāma karāvā ||
आसिष दीन्हि सखीं हरषानीं । निज समाज लइ गई सयानीं ॥
बिस्वामित्र मिले पुनि आई । पद-सरोज मेले दोउ भाई ॥
āsiṣa dīnhi sakhīṃ haraṣānīṃ | nija samāja lai gaī sayānīṃ ||
bisvāmitra mile puni āī | pada-saroja mele dou bhāī ||
राम लखन दसरथ के ढोटा । दीन्हि असीस देखि भल जोटा ॥
रामहिं चितइ रहे थकि लोचन । रूप अपार-मार-मद मोचन ॥
rāma lakhana dasaratha ke ḍhoṭā | dīnhi asīsa dekhi bhala joṭā ||
rāmahiṃ citai rahe thaki locana | rūpa apāra-māra-mada mocana ||
बहुरि बिलोकि बिदेह सन, कहहु काह अति भीर ।
पूछत जानि अजान जिमि, ब्यापेउ कोप सरीर ॥
bahuri biloki bideha sana, kahahu kāha ati bhīra |
pūchata jāni ajāna jimi, byāpeu kopa sarīra ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0