बालकाण्ड

अध्याय 242: ज्ञानी, योगी और सीता का दर्शन

5 श्लोक · 242 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

ज्ञानी, योगी और सीता का दर्शन

देखने वालों का वर्णन आगे चलता है। विद्वानों को प्रभु अनेक मुख, हाथ, पैर और नेत्रों वाले विराट रूप में दिखे। जनक के कुटुंबियों को वे प्रिय सगे लगे। जनक और रानियों की प्रीति अपने बालक जैसी थी, जो कही नहीं जा सकती। योगियों को वे शांत, शुद्ध और स्वयं प्रकाश परम तत्व के रूप में दिखे। हरि-भक्तों ने उन्हें सब सुख देने वाले इष्टदेव के रूप में देखा। सीता जिस भाव से श्रीराम को देख रही थीं, वह स्नेह कहने योग्य नहीं, वे स्वयं न कह सकीं तो कोई कवि कैसे कहे। जिसका जैसा भाव था, उसने कोसलराज को वैसा ही देखा। राजसमाज में दोनों किशोर ऐसे शोभित हैं मानो संसार भर के नेत्रों के चोर हों।

242.1

बिदुषन्ह प्रभु बिराट मय दीसा । बहु मुख-कर-पग-लोचन-सीसा ॥
जनक जाति अवलोकहिँ कैसे । सजन सगे प्रिय लागहिँ जैसें ॥

biduṣanha prabhu birāṭa maya dīsā | bahu mukha-kara-paga-locana-sīsā ||
janaka jāti avalokahim̐ kaise | sajana sage priya lāgahim̐ jaiseṃ ||

242.2

सहित बिदेह बिलोकहिँ रानी । सिसु सम प्रीति न जाइ बखानी ॥
जोगिन्ह परम-तत्व-मय मासा । सान्त-सुद्ध-सम सहज प्रकासा ॥

sahita bideha bilokahim̐ rānī | sisu sama prīti na jāi bakhānī ||
joginha parama-tatva-maya māsā | sānta-suddha-sama sahaja prakāsā ||

242.3

हरिभगतन्ह देखे दोउ भ्राता । इष्टदेव इव सब सुख-दाता ॥
रामहिँ चितव भाव जेहि सीया । सो सनेह सुख नहिँ कथनीया ॥

haribhagatanha dekhe dou bhrātā | iṣṭadeva iva saba sukha-dātā ||
rāmahim̐ citava bhāva jehi sīyā | so saneha sukha nahim̐ kathanīyā ||

242.4

उर अनुभवति न कहि सक सोऊ । कवन प्रकार कहइ कबि कोऊ ॥
जेहि बिधि रहा जाहि जस भाऊ । तेहिं तस देखेउ कोसलराऊ ॥

ura anubhavati na kahi saka soū | kavana prakāra kahai kabi koū ||
jehi bidhi rahā jāhi jasa bhāū | tehiṃ tasa dekheu kosalarāū ||

दो॰ 242दोहा

राजत राज-समाज महँ, कोसलराज-किसोर ।
सुन्दर स्यामल गौर तनु, बिस्व-बिलोचन चोर ॥

rājata rāja-samāja maham̐, kosalarāja-kisora |
sundara syāmala gaura tanu, bisva-bilocana cora ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0