देखने वालों का वर्णन आगे चलता है। विद्वानों को प्रभु अनेक मुख, हाथ, पैर और नेत्रों वाले विराट रूप में दिखे। जनक के कुटुंबियों को वे प्रिय सगे लगे। जनक और रानियों की प्रीति अपने बालक जैसी थी, जो कही नहीं जा सकती। योगियों को वे शांत, शुद्ध और स्वयं प्रकाश परम तत्व के रूप में दिखे। हरि-भक्तों ने उन्हें सब सुख देने वाले इष्टदेव के रूप में देखा। सीता जिस भाव से श्रीराम को देख रही थीं, वह स्नेह कहने योग्य नहीं, वे स्वयं न कह सकीं तो कोई कवि कैसे कहे। जिसका जैसा भाव था, उसने कोसलराज को वैसा ही देखा। राजसमाज में दोनों किशोर ऐसे शोभित हैं मानो संसार भर के नेत्रों के चोर हों।