सेवत तोहि सुलभ फल चारी । बरदायनी पुरारि पिआरी ॥
देबि पूजि पद-कमल तुम्हारे । सुर नर मुनि सब होहिँ सुखारे ॥
sevata tohi sulabha phala cārī | baradāyanī purāri piārī ||
debi pūji pada-kamala tumhāre | sura nara muni saba hohim̐ sukhāre ||
6 श्लोक · 236 में से 361
सीता आगे कहती हैं, हे त्रिपुरारि की प्रिया, वर देने वाली, आपकी सेवा से चारों फल सुलभ हो जाते हैं। आपके चरण-कमल पूजकर देवता, मनुष्य और मुनि सब सुखी होते हैं। आप सबके हृदय में बसती हैं, मेरा मनोरथ भली भाँति जानती हैं, इसलिए मैंने उसे प्रकट नहीं किया। यह कहकर वैदेही ने चरण पकड़ लिए। विनय और प्रेम के वश होकर भवानी की माला खिसक पड़ी और मूर्ति मुस्कुरा उठी। सीता ने आदर से प्रसाद सिर पर धरा। गौरी हर्ष से बोलीं, सीता, मेरा आशीर्वाद सत्य है, तुम्हारी मनोकामना पूरी होगी। नारद जी का वचन सदा सच्चा है, जिस सहज सुंदर साँवले, करुणानिधान वर पर तुम्हारा मन रचा है, वही मिलेगा। सखियों सहित सीता प्रसन्न होकर घर चलीं और उनके बाएँ अंग फड़कने लगे।
सेवत तोहि सुलभ फल चारी । बरदायनी पुरारि पिआरी ॥
देबि पूजि पद-कमल तुम्हारे । सुर नर मुनि सब होहिँ सुखारे ॥
sevata tohi sulabha phala cārī | baradāyanī purāri piārī ||
debi pūji pada-kamala tumhāre | sura nara muni saba hohim̐ sukhāre ||
मोर मनोरथ जानहु नीकें । बसहु सदा उर-पुर सबही कें ॥
कीन्हेउँ प्रगट न कारन तेहीं । अस कहि चरन गहे बैदेहीं ॥
mora manoratha jānahu nīkeṃ | basahu sadā ura-pura sabahī keṃ ||
kīnheum̐ pragaṭa na kārana tehīṃ | asa kahi carana gahe baidehīṃ ||
बिनय प्रेम-बस भई भवानी । खसी माल मूरति मुसुकानी ॥
सादर सियँ प्रसाद सिर धरेऊ । बोली गौरि हरष हियँ भरेऊ ॥
binaya prema-basa bhaī bhavānī | khasī māla mūrati musukānī ||
sādara siyam̐ prasāda sira dhareū | bolī gauri haraṣa hiyam̐ bhareū ||
सुनु सिय सत्य असीस हमारी । पूजिहि मन-कामना तुम्हारी ॥
नारद बचन सदा सुचि साँचा । सो बर मिलिहि जाहिँ मन राचा ॥
sunu siya satya asīsa hamārī | pūjihi mana-kāmanā tumhārī ||
nārada bacana sadā suci sām̐cā | so bara milihi jāhim̐ mana rācā ||
मन जाहिँ राचेउ मिलिहि सो बर-सहज सुन्दर साँवरो ।
करुना निधान सुजान सील सनेह जानत रावरो ॥
एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय, सहित हियँ हरषित अली ।
तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि, मुदित मन मन्दिर चली ॥
mana jāhim̐ rāceu milihi so bara-sahaja sundara sām̐varo |
karunā nidhāna sujāna sīla saneha jānata rāvaro ||
ehi bhām̐ti gauri asīsa suni siya, sahita hiyam̐ haraṣita alī |
tulasī bhavānihi pūji puni puni, mudita mana mandira calī ||
जानि गौरि अनुकूल, सिय-हिय-हरष न जाइ कहि ।
मञ्जुल-मङ्गल-मूल, बाम अङ्ग फरकन लगे ॥
jāni gauri anukūla, siya-hiya-haraṣa na jāi kahi |
mañjula-maṅgala-mūla, bāma aṅga pharakana lage ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0