बालकाण्ड

अध्याय 231: श्रीराम रघुवंश की मर्यादा कहते हैं

5 श्लोक · 231 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

श्रीराम रघुवंश की मर्यादा कहते हैं

श्रीराम लक्ष्मण से कहते हैं, यह वही जनकनंदिनी हैं जिनके लिए धनुष-यज्ञ हो रहा है। गौरी-पूजन को आई हैं और फुलवारी में प्रकाश फैलाती घूम रही हैं। इनकी अलौकिक शोभा देखकर मेरा सहज पवित्र मन क्षुब्ध हो गया है। इसका कारण विधाता ही जानें, मेरे शुभ अंग फड़क रहे हैं। रघुवंशियों का स्वभाव है कि उनका मन कभी कुमार्ग पर पैर नहीं रखता, और मेरे मन ने स्वप्न में भी पराई स्त्री को नहीं देखा। जिनकी पीठ रण में शत्रु नहीं देखते, जिनका मन पराई स्त्री नहीं हरती और जिनसे याचक ना नहीं सुनते, ऐसे पुरुष संसार में थोड़े हैं। बातें करते हुए भी प्रभु का मन भौंरे की तरह सीता के मुख-कमल की छवि का रस पीता रहा।

231.1

तात जनक तनया यह सोई । धनुषजग्य जेहि कारन होई ॥
पूजन गौरि सखीं लेइ आई । करत प्रकास फिरइ फुलवाई ॥

tāta janaka tanayā yaha soī | dhanuṣajagya jehi kārana hoī ||
pūjana gauri sakhīṃ lei āī | karata prakāsa phirai phulavāī ||

231.2

जासु बिलोकि अलौकिक सोभा । सहज पुनीत मोर मन छोभा ॥
सो सब कारन जान बिधाता । फरकहिँ सुभग अङ्ग सुनु भ्राता ॥

jāsu biloki alaukika sobhā | sahaja punīta mora mana chobhā ||
so saba kārana jāna bidhātā | pharakahim̐ subhaga aṅga sunu bhrātā ||

231.3

रघुवंसिन्ह कर सहज सुभाऊ । मनु कुपन्थ पग धरइ न काऊ ॥
मोहि अतिसय प्रतीति मन केरी । जेहिं सपनेहुँ पर-नारि न हेरी ॥

raghuvaṃsinha kara sahaja subhāū | manu kupantha paga dharai na kāū ||
mohi atisaya pratīti mana kerī | jehiṃ sapanehum̐ para-nāri na herī ||

231.4

जिन्ह कै लहहिँ न रिपु रन पीठी । नहिँ पावहिँ परतिय मन डीठी ॥
मङ्गन लहहिँ न जिन्ह के नाहीँ । ते नर बर थोरे जग माहीँ ॥

jinha kai lahahim̐ na ripu rana pīṭhī | nahim̐ pāvahim̐ paratiya mana ḍīṭhī ||
maṅgana lahahim̐ na jinha ke nāhīm̐ | te nara bara thore jaga māhīm̐ ||

दो॰ 231दोहा

करत बतकही अनुज सन, मन सिय रूप लोभान ।
मुख-सरोज मकरन्द-छबि, करइ मधुप इव पान ॥

karata batakahī anuja sana, mana siya rūpa lobhāna |
mukha-saroja makaranda-chabi, karai madhupa iva pāna ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0