कंगन, करधनी और पायल की ध्वनि सुनकर श्रीराम लक्ष्मण से कहते हैं, मानो कामदेव ने विश्व-विजय के लिए नगाड़ा बजा दिया हो। उन्होंने उस ओर देखा और सीता के मुखचंद्र के लिए उनके नेत्र चकोर बन गए। नेत्र ऐसे स्थिर हुए मानो पलकों में बसने वाले राजा निमि सकुचाकर हट गए हों। प्रभु हृदय में सराहते रहे, पर मुँह से वचन न निकले। मानो ब्रह्मा ने अपनी सारी निपुणता इन्हीं में दिखा दी हो। वे सुंदरता को भी सुंदर करती हैं, जैसे छवि के घर में दीपशिखा जल रही हो। कवि कहते हैं कि सब उपमाएँ जूठी हो चुकी हैं। फिर अपनी दशा विचारकर प्रभु पवित्र मन से छोटे भाई से बोले।