ब्रह्म के दो स्वरूप हैं, निर्गुण और सगुण, दोनों अकथ और अगाध। तुलसीदास के मत में नाम दोनों से बड़ा है, क्योंकि उसने अपने बल से दोनों को वश में कर रखा है। वे विद्वानों से कहते हैं कि इसे ढिठाई न समझें, यह उनके मन का विश्वास है। दोनों स्वरूपों का ज्ञान अग्नि जैसा है, एक लकड़ी में छिपी, एक प्रकट। दोनों कठिन हैं, पर नाम से दोनों सुगम हो जाते हैं। सत, चेतन और आनन्दघन अविनाशी ब्रह्म हर हृदय में निर्विकार रहता है, फिर भी सब जीव दीन और दुखी हैं। नाम के निरूपण और जप से ही वह प्रकट होता है, जैसे परखने पर ही रत्न का मूल्य प्रकट होता है।