बालकाण्ड

अध्याय 223: क्या सुकुमार राजकुमार शिवधनुष उठा पाएँगे

5 श्लोक · 223 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

क्या सुकुमार राजकुमार शिवधनुष उठा पाएँगे

एक और कहती है, सखी, तुमने ठीक कहा; यह विवाह सबके लिए अत्यन्त हितकारी है। कोई कहती है, शंकर का धनुष कठोर है और ये श्यामल कोमल शरीर वाले किशोर हैं। तब दूसरी कोमल वाणी में कहती है, सखी, कोई कोई इनके विषय में कहते हैं कि ये देखने में छोटे हैं पर इनका प्रभाव बड़ा है। जिनके चरणकमलों की धूल छूकर अहल्या तर गईं, वे क्या शिवधनुष तोड़े बिना रहेंगे? यह भरोसा भूलकर भी मत छोड़ो। जिस विधाता ने सीता को रचकर सँवारा, उसी ने सोच विचारकर यह श्यामल वर रचा है। उसकी बात सुनकर सब हर्षित होती हैं और कोमल वाणी में कहती हैं, ऐसा ही हो। स्त्रियाँ हर्षित होकर फूल बरसाती हैं; जहाँ जहाँ दोनों भाई जाते हैं, वहाँ वहाँ परम आनन्द छा जाता है।

223.1

बोली अपर कहेहु सखि नीका । एहिं बिबाह अति हित सबहीं का ॥
कोउ कह सङ्कर चाप कठोरा । ये स्यामल मृदुगात किसोरा ॥

bolī apara kahehu sakhi nīkā | ehiṃ bibāha ati hita sabahīṃ kā ||
kou kaha saṅkara cāpa kaṭhorā | ye syāmala mṛdugāta kisorā ||

223.2

सब असमञ्जस अहइ सयानी । यह सुनि अपर कहइ मृदु बानी ॥
सखि इन्ह कहँ कोउ कोउ अस कहहीँ । बड़ प्रभाउ देखत लघु अहहीँ ॥

saba asamañjasa ahai sayānī | yaha suni apara kahai mṛdu bānī ||
sakhi inha kaham̐ kou kou asa kahahīm̐ | bar̤a prabhāu dekhata laghu ahahīm̐ ||

223.3

परसि जासु पद-पङ्कज धूरी । तरी अहल्या कृत-अघ-भूरी ॥
से कि रहिहि बिनु सिव-धनु तोरें । यह प्रतीति परिहरिअ न भोरें ॥

parasi jāsu pada-paṅkaja dhūrī | tarī ahalyā kṛta-agha-bhūrī ||
se ki rahihi binu siva-dhanu toreṃ | yaha pratīti pariharia na bhoreṃ ||

223.4

जेहिं बिरज्चि रचि सीय सँवारी । तेहिं स्यामल बर रचेउ बिचारी ॥
तासु बचन सुनि सब हरषानीं । ऐसइ होउ कहहिँ मृदु बानी ॥

jehiṃ birajci raci sīya sam̐vārī | tehiṃ syāmala bara raceu bicārī ||
tāsu bacana suni saba haraṣānīṃ | aisai hou kahahim̐ mṛdu bānī ||

दो॰ 223दोहा

हियँ हरषहिँ बरषहिँ सुमन, सुमुखि सुलोचनि-वृन्द ।
जाहिँ जहाँ जहँ बन्धु दोउ, तहँ तहँ परमानन्द ॥

hiyam̐ haraṣahim̐ baraṣahim̐ sumana, sumukhi sulocani-vṛnda |
jāhim̐ jahām̐ jaham̐ bandhu dou, taham̐ taham̐ paramānanda ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0