बालकाण्ड

अध्याय 219: दोनों भाइयों का नगर-भ्रमण

5 श्लोक · 219 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

दोनों भाइयों का नगर-भ्रमण

मुनि के चरणकमलों की वन्दना करके संसार की आँखों को सुख देने वाले दोनों भाई चल पड़ते हैं। उनकी शोभा देखकर बालकों के झुण्ड साथ हो लेते हैं। पीले वस्त्र, कमर में फेंटा, हाथों में सुन्दर धनुष बाण, श्याम और गौर शरीर पर चन्दन की खौर। सिंह जैसे कन्धे, विशाल भुजाएँ, छाती पर गजमुक्ता की सुन्दर माला; कमल जैसे नेत्र और तीनों तापों को हरने वाला चन्द्रमुख। कानों में सोने के कर्णफूल, ऐसी चितवन मानो चित्त चुरा ले, सुन्दर टेढ़ी भौंहें और तिलक की अनुपम रेखा। सिर पर सुन्दर चौतनी टोपी और काले घुँघराले केश; दोनों भाई नख से शिख तक सुन्दर हैं और अंग अंग की शोभा ठीक जगह पर है।

219.1

मुनि-पद-कमल बन्दि दोउ भ्राता । चले लोक-लोचन सुख-दाता ॥
बालक-वृन्द देखि अति सोभा । लगे सङ्ग लोचन मन लोभा ॥

muni-pada-kamala bandi dou bhrātā | cale loka-locana sukha-dātā ||
bālaka-vṛnda dekhi ati sobhā | lage saṅga locana mana lobhā ||

219.2

पीत-बसन परिकर कटि भाथा । चारु चाप सर सोहत हाथा ॥
तन अनुहरत सुचन्दन खोरी । स्यामल गौर मनोहर जोरी ॥

pīta-basana parikara kaṭi bhāthā | cāru cāpa sara sohata hāthā ||
tana anuharata sucandana khorī | syāmala gaura manohara jorī ||

219.3

केहरि-कन्धर बाहु बिसाला । उर अति रुचिर नाग-मनि-माला ॥
सुभग सोन सरसीरुह लोचन । बदन-मयङ्क ताप त्रय मोचन ॥

kehari-kandhara bāhu bisālā | ura ati rucira nāga-mani-mālā ||
subhaga sona sarasīruha locana | badana-mayaṅka tāpa traya mocana ||

219.4

कानन्हि कनक-फूल छबि देहीँ । चितवत चितहि चोरि जनु लेहीँ ॥
चितवनि चारु भृकुटि बर बाँकी । तिलक रेखा सोभा जनु चाँकी ॥

kānanhi kanaka-phūla chabi dehīm̐ | citavata citahi cori janu lehīm̐ ||
citavani cāru bhṛkuṭi bara bām̐kī | tilaka rekhā sobhā janu cām̐kī ||

दो॰ 219दोहा

रुचिर चौतनीं सुभग सिर, मेचक कुञ्चित केस ।
नख-सिख सुन्दर बन्धु दोउ, सोभा सकल सुदेस ॥

rucira cautanīṃ subhaga sira, mecaka kuñcita kesa |
nakha-sikha sundara bandhu dou, sobhā sakala sudesa ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0