लक्ष्मण के मन में जनकपुर देखने की बड़ी लालसा है, पर प्रभु के भय और मुनि के संकोच से वे कुछ कहते नहीं, बस मन में मुस्कराते हैं। श्रीराम छोटे भाई के मन की बात जान लेते हैं और उनके हृदय में भक्तवत्सलता उमड़ आती है। गुरु की आज्ञा पाकर वे अत्यन्त विनम्रता से, सकुचाते हुए मुस्कराकर कहते हैं, हे नाथ, लक्ष्मण नगर देखना चाहते हैं, पर संकोच से कहते नहीं। आपकी आज्ञा हो तो नगर दिखाकर तुरन्त ले आऊँ। मुनि प्रेम से कहते हैं, राम, तुम नीति क्यों न रखोगे? तुम धर्म के सेतु के रक्षक हो और प्रेम के वश सेवकों को सुख देते हो। सुख के भण्डार दोनों भाई जाकर नगर देख आओ और अपने सुन्दर मुख दिखाकर सबके नेत्र सफल करो।