बालकाण्ड

अध्याय 217: जनक द्वारा अतिथियों का सुन्दर निवास

5 श्लोक · 217 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

जनक द्वारा अतिथियों का सुन्दर निवास

जनक मुनि से कहते हैं, आपके चरणों के दर्शन पाकर मैं अपने पुण्य का प्रभाव नहीं कह सकता। ये दोनों भाई आनन्द को भी आनन्द देने वाले हैं, और इनकी आपस की प्रीति पवित्र और ब्रह्म और जीव के सहज स्नेह जैसी है। राजा बार बार प्रभु को निहारते हैं, शरीर पुलकित है और हृदय उत्साह से भरा है। मुनि को प्रणाम करके वे सबको नगर में ले जाते हैं और ऐसे सुन्दर भवन में ठहराते हैं जो हर ऋतु में सुख देता है। सब प्रकार की सेवा करके राजा घर जाते हैं। प्रभु ऋषियों के साथ भोजन और विश्राम करके भाई सहित बैठते हैं; अभी एक पहर दिन बाकी है।

217.1

मुनि तव चरन देखि कह राऊ । कहि न सकउँ निज पुन्य प्राभाऊ ॥
सुन्दर स्याम गौर दोउ भ्राता । आनँदहू के आनँद दाता ॥

muni tava carana dekhi kaha rāū | kahi na sakaum̐ nija punya prābhāū ||
sundara syāma gaura dou bhrātā | ānam̐dahū ke ānam̐da dātā ||

217.2

इन्ह कै प्रीति परसपर पावनि । कहि न जाइ मन भाव सुहावनि ॥
सुनहु नाथ कह मुदित बिदेहू । ब्रह्म-जीव इव सहज सनेहू ॥

inha kai prīti parasapara pāvani | kahi na jāi mana bhāva suhāvani ||
sunahu nātha kaha mudita bidehū | brahma-jīva iva sahaja sanehū ||

217.3

पुनि पुनि प्रभुहि चितव नरनाहू । पुलक गात उर अधिक उछाहू ॥
मुनिहि प्रसंसि नाइ पद सीसू । चलेउ लवाइ नगर अवनीसू ॥

puni puni prabhuhi citava naranāhū | pulaka gāta ura adhika uchāhū ||
munihi prasaṃsi nāi pada sīsū | caleu lavāi nagara avanīsū ||

217.4

सुन्दर सदन सुखद सब काला । तहाँ बास लेइ दीन्ह भुआला ॥
करि पूजा सब बिधि सेवकाई । गयउ राउ गृह विदा कराई ॥

sundara sadana sukhada saba kālā | tahām̐ bāsa lei dīnha bhuālā ||
kari pūjā saba bidhi sevakāī | gayau rāu gṛha vidā karāī ||

दो॰ 217दोहा

रिषय सङ्ग रघुबंस-मनि, करि भोजन बिश्रामु ।
बैठे प्रभु भ्राता सहित, दिवस रहा भरि जाम ॥

riṣaya saṅga raghubaṃsa-mani, kari bhojana biśrāmu |
baiṭhe prabhu bhrātā sahita, divasa rahā bhari jāma ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0