बालकाण्ड

अध्याय 215: श्रीराम को देखकर जनक की सुध-बुध खो जाना

5 श्लोक · 215 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

श्रीराम को देखकर जनक की सुध-बुध खो जाना

जनक मुनि के चरणों में सिर रखकर प्रणाम करते हैं और आशीर्वाद पाते हैं; वे ब्राह्मणों को प्रणाम करके अपना भाग्य सराहते हैं। विश्वामित्र कुशल पूछकर उन्हें बिठाते हैं। उसी समय फुलवारी देखने गए दोनों भाई लौटते हैं, श्याम और गौर, कोमल किशोर, विश्व का चित्त चुराने वाले। सब उठ खड़े होते हैं और मुनि उन्हें अपने पास बिठाते हैं। उन्हें देखकर सबके नेत्रों में जल भर आता है और शरीर पुलकित हो जाता है। वह मधुर मूर्ति देखकर विदेह राजा और भी विदेह हो जाते हैं। मन को प्रेम में डूबता जानकर वे विवेक से धीरज धरते हैं और मुनि के चरणों में सिर नवाकर गद्गद वाणी में बोलते हैं।

215.1

कीन्ह प्रनाम चरन धरि माथा । दीन्हि असीस मुदित मुनिनाथा ॥
बिप्र-वृन्द सब सादर बन्दे । जानि भाग्य बड़ राउ अनन्दे ॥

kīnha pranāma carana dhari māthā | dīnhi asīsa mudita munināthā ||
bipra-vṛnda saba sādara bande | jāni bhāgya bar̤a rāu anande ||

215.2

कुसल प्रस्न कहि बारहिँ बारा । विस्वामित्र नृपहि बैठारा ॥
तेहि अवसर आये दोउ भाई । गये रहे देखन फुलवाई ॥

kusala prasna kahi bārahim̐ bārā | visvāmitra nṛpahi baiṭhārā ||
tehi avasara āye dou bhāī | gaye rahe dekhana phulavāī ||

215.3

स्याम गौर मृदु बयस किसोरा । लोचन सुखद बिस्व-चित चोरा ॥
उठे सकल जब रघुपति आये । विस्वामित्र निकट बैठाये ॥

syāma gaura mṛdu bayasa kisorā | locana sukhada bisva-cita corā ||
uṭhe sakala jaba raghupati āye | visvāmitra nikaṭa baiṭhāye ||

215.4

भये सब सुखी देखि दोउ भ्राता । बारि बिलोचन पुलकित गाता ॥
मूरति मधुर मनोहर देखी । भयउ विदेह बिदेह बिसेखी ॥

bhaye saba sukhī dekhi dou bhrātā | bāri bilocana pulakita gātā ||
mūrati madhura manohara dekhī | bhayau videha bideha bisekhī ||

दो॰ 215दोहा

प्रेम मगन मन जानि नृप, करि बिबेक धरि धीर ।
बोलेउ मुनि-पद नाइ सिर, गदगद गिरा गँभीर ॥

prema magana mana jāni nṛpa, kari bibeka dhari dhīra |
boleu muni-pada nāi sira, gadagada girā gam̐bhīra ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0