बालकाण्ड

अध्याय 214: आम के बगीचे में डेरा

5 श्लोक · 214 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

आम के बगीचे में डेरा

राजमहल के द्वारों में वज्र जैसे किवाड़ हैं और वहाँ राजाओं, नटों और भाटों की भीड़ रहती है; शालाएँ सदा घोड़ों, हाथियों और रथों से भरी हैं, और मन्त्रियों के घर भी राजमहल जैसे हैं। नगर के बाहर सरोवरों और नदियों के पास बहुत से राजा उतरे हुए हैं। एक सुहावनी अमराई देखकर विश्वामित्र कहते हैं, हे रघुवीर, मेरा मन यहीं मान गया है, यहीं ठहरिए। बहुत अच्छा, नाथ, कहकर प्रभु मुनियों के साथ वहीं उतरते हैं। महामुनि के आने का समाचार पाकर मिथिलापति मन्त्रियों, योद्धाओं, ब्राह्मणों, गुरु और कुटुम्बियों को साथ लेकर प्रसन्न मन से उनसे मिलने चलते हैं।

214.1

सुभग द्वार सब कुलिस कपाटा । भूप भीर नट मागध भाटा ॥
बनी बिसाल बाजि-गज-साला । हय-गय-रथ सङ्कुल सब काला ॥

subhaga dvāra saba kulisa kapāṭā | bhūpa bhīra naṭa māgadha bhāṭā ||
banī bisāla bāji-gaja-sālā | haya-gaya-ratha saṅkula saba kālā ||

214.2

सूर सचिव सेनप बहुतेरे । नृप गृह सरिस सदन सब केरे ॥
पुर बाहेर सर सारित समीपा । उतरे जहँ तहँ बिपुल महीपा ॥

sūra saciva senapa bahutere | nṛpa gṛha sarisa sadana saba kere ||
pura bāhera sara sārita samīpā | utare jaham̐ taham̐ bipula mahīpā ||

214.3

देखि अनूप एक अँबराई । सब सुपास सब भाँति सुहाई ॥
कौसिक कहेउ मोर मन माना । इहाँ रहिय रघुबीर सुजाना ॥

dekhi anūpa eka am̐barāī | saba supāsa saba bhām̐ti suhāī ||
kausika kaheu mora mana mānā | ihām̐ rahiya raghubīra sujānā ||

214.4

भलेहिं नाथ कहि कृपा निकेता । उतरे तहँ मुनि-वृन्द समेता ॥
बिस्वामित्र महामुनि आये । समाचार मिथिलापति पाये ॥

bhalehiṃ nātha kahi kṛpā niketā | utare taham̐ muni-vṛnda sametā ||
bisvāmitra mahāmuni āye | samācāra mithilāpati pāye ||

दो॰ 214दोहा

सङ्ग सचिव सुचि भूरि भट, भूसुर बर गुरु ज्ञाति ।
चले मिलन मुनिनायकहि, मुदित राउ एहि भाँति ॥

saṅga saciva suci bhūri bhaṭa, bhūsura bara guru jñāti |
cale milana munināyakahi, mudita rāu ehi bhām̐ti ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0