बालकाण्ड

अध्याय 208: दशरथ की व्यथा और पुत्रों की विदाई

7 श्लोक · 208 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

दशरथ की व्यथा और पुत्रों की विदाई

यह अप्रिय वाणी सुनकर राजा का हृदय काँप उठता है और मुख मुरझा जाता है। वे कहते हैं, बुढ़ापे में मैंने चार पुत्र पाए; भूमि, गौएँ, धन माँगिए, प्राण भी माँगिए तो पल भर में दे दूँ, पर राम को देते नहीं बनता। कहाँ घोर निशाचर और कहाँ मेरा सुकुमार पुत्र! प्रेम में सनी यह वाणी सुनकर ज्ञानी मुनि मन में हर्षित होते हैं। तब वसिष्ठ बहुत प्रकार से समझाते हैं और राजा का सन्देह मिट जाता है। राजा दोनों पुत्रों को हृदय से लगाकर मुनि से कहते हैं, ये मेरे प्राण हैं, अब आप ही इनके पिता हैं। आशीष देकर वे पुत्र सौंपते हैं, और दोनों भाई माता को सिर नवाकर हर्ष से मुनि का भय हरने चल पड़ते हैं।

208.1

सुनि राजा अति अप्रिय बानी । हृदय-कम्प मुख-दुति-कुमुलानी ॥
चौथेंपन पायउँ सुत चारी । बिप्र बचन नहिँ कहेउ बिचारी ॥

suni rājā ati apriya bānī | hṛdaya-kampa mukha-duti-kumulānī ||
cautheṃpana pāyaum̐ suta cārī | bipra bacana nahim̐ kaheu bicārī ||

208.2

माँगहु भूमि धेनु धन कोसा । सरबस देउँ आजु सहरोसा ॥
देह प्रान तेँ प्रिय कछु नाहीँ । सोउ मुनि देउँ निमिष एक माहीँ ॥

mām̐gahu bhūmi dhenu dhana kosā | sarabasa deum̐ āju saharosā ||
deha prāna tem̐ priya kachu nāhīm̐ | sou muni deum̐ nimiṣa eka māhīm̐ ||

208.3

सब सुत प्रिय मोहि प्रान कि नाँई । राम देत नहिँ बनइ गोसाई ॥
कहँ निसिचर अति घोर कठोरा । कहँ सुन्दर सुत परम किसोरा ॥

saba suta priya mohi prāna ki nām̐ī | rāma deta nahim̐ banai gosāī ||
kaham̐ nisicara ati ghora kaṭhorā | kaham̐ sundara suta parama kisorā ||

208.4

सुनि नृप-गिरा प्रेम-रस-सानी । हृदयँ हरष माना मुनि ज्ञानी ॥
तब बसिष्ठ बहु बिधि समुझावा । नृप सन्देह नास कहँ पावा ॥

suni nṛpa-girā prema-rasa-sānī | hṛdayam̐ haraṣa mānā muni jñānī ||
taba basiṣṭha bahu bidhi samujhāvā | nṛpa sandeha nāsa kaham̐ pāvā ||

208.5

अति आदर दोउ तनय बोलाये । हृदयँ लाइ बहु भाँति सिखाये ॥
मेरे प्रान नाथ सुत दोऊ । तुम्ह मुनि पिता आन नहिँ कोऊ ॥

ati ādara dou tanaya bolāye | hṛdayam̐ lāi bahu bhām̐ti sikhāye ||
mere prāna nātha suta doū | tumha muni pitā āna nahim̐ koū ||

दो॰ 208 (क)दोहा

सौँपे भूप रिषिहि सुत, बहु बिधि देइ असीस ।
जननी भवन गये प्रभु, चले नाइ पद सीस ॥

saum̐pe bhūpa riṣihi suta, bahu bidhi dei asīsa |
jananī bhavana gaye prabhu, cale nāi pada sīsa ||

208.सो॰ 208 (ख)सोरठा

पुरुष सिंह दोउ बीर, हरषि चले मुनि भय हरन ।
कृपासिन्धु मतिधीर, अखिल-बिस्व कारन-करन ॥

puruṣa siṃha dou bīra, haraṣi cale muni bhaya harana |
kṛpāsindhu matidhīra, akhila-bisva kārana-karana ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0