बालकाण्ड

अध्याय 201: एक साथ दो बालकों का दर्शन

5 श्लोक · 201 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

एक साथ दो बालकों का दर्शन

एक बार माता कौसल्या बालक को नहलाकर, शृंगार करके पालने में सुला देती हैं। फिर कुलदेवता भगवान की पूजा के लिए स्नान करती हैं, पूजा करके नैवेद्य चढ़ाती हैं और रसोई में चली जाती हैं। लौटती हैं तो देखती हैं कि पुत्र नैवेद्य खा रहा है। डरकर शिशु के पास जाती हैं तो बालक वहाँ सोया मिलता है। फिर आकर देखती हैं तो वही पुत्र यहाँ भी है। हृदय काँपता है, मन धीरज नहीं धरता। यहाँ भी बालक, वहाँ भी; मेरी बुद्धि भ्रमित है या कोई और बात है? माता को व्याकुल देखकर श्रीराम मधुर मुस्कराते हैं और उन्हें अपना अद्भुत अखण्ड रूप दिखाते हैं, जिसके रोम रोम में करोड़ों ब्रह्माण्ड हैं।

201.1

एक बार जननीं अन्हवाये । करि सिंगार पलनाँ पौढ़ाये ॥
निज कुल इष्टदेव भगवाना । पूजा हेतु कीन्ह अस्नाना ॥

eka bāra jananīṃ anhavāye | kari siṃgāra palanām̐ paur̤hāye ||
nija kula iṣṭadeva bhagavānā | pūjā hetu kīnha asnānā ||

201.2

करि पूजा नैबेद्य चढ़ावा । आपु गई जहँ पाक बनावा ॥
बहुरि मातु तहवाँ चलि आई । भोजन करत देख सुत जाई ॥

kari pūjā naibedya car̤hāvā | āpu gaī jaham̐ pāka banāvā ||
bahuri mātu tahavām̐ cali āī | bhojana karata dekha suta jāī ||

201.3

गह जननी सिसु पहिँ भयभीता । देखा बाल तहाँ पुनि सूता ॥
बहुरि आइ देखा सुत सोई । हृदयँ कम्प मन धीर न होई ॥

gaha jananī sisu pahim̐ bhayabhītā | dekhā bāla tahām̐ puni sūtā ||
bahuri āi dekhā suta soī | hṛdayam̐ kampa mana dhīra na hoī ||

201.4

इहाँ उहाँ दुइ बालक देखा । मति भ्रम मोर कि आन बिसेखा ॥
देखि राम जननी अकुलानी । प्रभु हँसि दीन्ह मधुर मुसुकानी ॥

ihām̐ uhām̐ dui bālaka dekhā | mati bhrama mora ki āna bisekhā ||
dekhi rāma jananī akulānī | prabhu ham̐si dīnha madhura musukānī ||

दो॰ 201दोहा

देखरावा मातहि निज, अदभुत रूप अखंड ।
रोम रोम प्रति लागे, कोटि कोटि ब्रह्मंड ॥

dekharāvā mātahi nija, adabhuta rūpa akhaṃḍa |
roma roma prati lāge, koṭi koṭi brahmaṃḍa ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0