बालकाण्ड

अध्याय 199: बालक श्रीराम का रूप-वर्णन

7 श्लोक · 199 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

बालक श्रीराम का रूप-वर्णन

कवि बालक का रूप चरण से शीश तक वर्णन करते हैं। श्याम शरीर में करोड़ों कामदेवों की शोभा है, नीलकमल और गम्भीर मेघ जैसी। लाल चरणकमलों के नख ऐसे चमकते हैं मानो कमल की पंखुड़ियों पर मोती बैठे हों; उनमें वज्र, ध्वजा और अंकुश की रेखाएँ हैं और नूपुर की ध्वनि मुनियों का मन मोहती है। कमर में करधनी, पेट पर तीन रेखाएँ, गहरी नाभि; विशाल भुजाओं में आभूषण, हृदय पर बघनखा और मणियों का हार, और भृगुचरण का चिह्न। शंख जैसा कण्ठ, लाल अधरों में दो दो दाँत, अत्यन्त प्रिय तोतली बोली, घुँघराले केश जिन्हें माता बड़े चाव से सँवारती हैं, पीली झँगुलिया और घुटनों और हाथों के बल चलना। इस रूप को वेद और शेष नहीं कह सकते; इसे वही जानते हैं जिन्होंने सपने में भी देखा।

199.1

काम कोटि छबि स्याम सरीरा । नील कञ्ज बारिद गम्भीरा ॥
अरुन चरन-पङ्कज नख जोती । कमल दलन्हि बैठे जनु मोती ॥

kāma koṭi chabi syāma sarīrā | nīla kañja bārida gambhīrā ||
aruna carana-paṅkaja nakha jotī | kamala dalanhi baiṭhe janu motī ||

199.2

रेख कुलिस ध्वज अङ्कुस सोहे । नूपुर धुनि सुनि मुनि मन मोहे ॥
कटि किङ्किनी उदर त्रय रेखा । नाभि गँभीर जान जेहि देखा ॥

rekha kulisa dhvaja aṅkusa sohe | nūpura dhuni suni muni mana mohe ||
kaṭi kiṅkinī udara traya rekhā | nābhi gam̐bhīra jāna jehi dekhā ||

199.3

भुज बिसाल भूषन जुत भूरी । हियँ हरि-नख अति सोभा रूरी ॥
उर मनि-हार-पदिक की सोभा । बिप्र-चरन देखत मन लोभा ॥

bhuja bisāla bhūṣana juta bhūrī | hiyam̐ hari-nakha ati sobhā rūrī ||
ura mani-hāra-padika kī sobhā | bipra-carana dekhata mana lobhā ||

199.4

कम्बु कंठ अति चिबुक सुहाई । आनन अमित मदन-छबि छाई ॥
दुइ दुइ दसन अधर अरुनारे । नासा तिलक को बरनइ पारे ॥

kambu kaṃṭha ati cibuka suhāī | ānana amita madana-chabi chāī ||
dui dui dasana adhara arunāre | nāsā tilaka ko baranai pāre ||

199.5

सुन्दर स्रवन सुचारु कपोला । अति प्रिय मधुर तोतरे बोला ॥
चिक्कन कच कुञ्चित गभुआरे । बहु प्रकार रचि मातु सँवारे ॥

sundara sravana sucāru kapolā | ati priya madhura totare bolā ||
cikkana kaca kuñcita gabhuāre | bahu prakāra raci mātu sam̐vāre ||

199.6

पीत झगुलिआ तनु पहिराई । जानु-पानि विचरनि मोहि भाई ॥
रूप सकहिँ नहिँ कहि स्रुति सेखा । सो जानहिँ सपनेहुँ जिन्ह देखा ॥

pīta jhaguliā tanu pahirāī | jānu-pāni vicarani mohi bhāī ||
rūpa sakahim̐ nahim̐ kahi sruti sekhā | so jānahim̐ sapanehum̐ jinha dekhā ||

दो॰ 199दोहा

सुख सन्दोह मोह पर, ज्ञान-गिरा-गोतीत ।
दम्पति परम प्रेम-बस, कर सिसु चरित पुनीत ॥

sukha sandoha moha para, jñāna-girā-gotīta |
dampati parama prema-basa, kara sisu carita punīta ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0