बालकाण्ड

अध्याय 198: चारों भाई और कौसल्या की गोद

5 श्लोक · 198 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

चारों भाई और कौसल्या की गोद

वसिष्ठ राजा से कहते हैं कि तुम्हारे चारों पुत्र वेद के तत्व, मुनियों के धन और शिवजी के प्राण हैं। बचपन से ही लक्ष्मण श्रीराम को स्वामी जानकर उनके चरणों से प्रीति करते हैं, और भरत और शत्रुघ्न में स्वामी और सेवक जैसा प्रेम है। श्याम और गौर की दोनों जोड़ियाँ ऐसी सुन्दर हैं कि माताएँ नज़र उतारने को तिनका तोड़ती हैं। चारों शील, रूप और गुण के धाम हैं, फिर भी सुख के सागर श्रीराम सबसे बढ़कर हैं; उनकी मुस्कान कृपा की चाँदनी है। माताएँ कभी गोद में, कभी पालने में उन्हें दुलारती हैं। जो व्यापक, निरंजन, निर्गुण, अजन्मा ब्रह्म है, वही प्रेम और भक्ति के वश कौसल्या की गोद में है।

198.1

धरे नाम गुरु हृदयँ बिचारी । बेद-तत्व नृप तव सुत चारी ॥
मुनि-धन जन-सरबस सिव-प्राना । बाल केलि-तेहिं सुख माना ॥

dhare nāma guru hṛdayam̐ bicārī | beda-tatva nṛpa tava suta cārī ||
muni-dhana jana-sarabasa siva-prānā | bāla keli-tehiṃ sukha mānā ||

198.2

बारेहि तेँ निज हित पति जानी । लछिमन राम-चरन-रति मानी ॥
भरत सत्रुहन दूनउ भाई । प्रभु सेवक जसि प्रीति बड़ाई ॥

bārehi tem̐ nija hita pati jānī | lachimana rāma-carana-rati mānī ||
bharata satruhana dūnau bhāī | prabhu sevaka jasi prīti bar̤āī ||

198.3

स्याम गौर सुन्दर दोउ जोरी । निरखहिँ छबि जननीं तृन तोरी ॥
चारिउ सील-रूप गुन धामा । तदपि अधिक सुख-सागर-रामा ॥

syāma gaura sundara dou jorī | nirakhahim̐ chabi jananīṃ tṛna torī ||
cāriu sīla-rūpa guna dhāmā | tadapi adhika sukha-sāgara-rāmā ||

198.4

हृदयँ अनुग्रह इन्दु प्रकासा । सूचत किरन मनोहर हासा ॥
कबहुँ उछङ्ग कबहुँ बर पलना । मातु दुलारइ कहि प्रिय ललना ॥

hṛdayam̐ anugraha indu prakāsā | sūcata kirana manohara hāsā ||
kabahum̐ uchaṅga kabahum̐ bara palanā | mātu dulārai kahi priya lalanā ||

दो॰ 198दोहा

व्यापक-ब्रह्म निरञ्जन, निर्गुन बिगत बिनोद ।
सो अज प्रेम-भगति बस, कौसल्या के गोद ॥

vyāpaka-brahma nirañjana, nirguna bigata binoda |
so aja prema-bhagati basa, kausalyā ke goda ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0