बालकाण्ड

अध्याय 196: शिवजी और काकभुशुण्डि का अयोध्या में विचरण

5 श्लोक · 196 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

शिवजी और काकभुशुण्डि का अयोध्या में विचरण

यह रहस्य कोई नहीं जानता; अन्त में सूर्यदेव प्रभु के गुण गाते हुए आगे बढ़ते हैं। देवता, मुनि और नाग अपने भाग्य की सराहना करते हुए लौटते हैं। फिर शिवजी गिरिजा से अपनी एक चोरी कहते हैं: काकभुशुण्डि और मैं मनुष्य रूप में वहाँ थे और हमें कोई नहीं पहचान सका। परम आनन्द और प्रेम में फूले हुए हम अपने को भूलकर गलियों में घूमते रहे। यह शुभ चरित वही जानता है जिस पर श्रीराम की कृपा हो। उस अवसर पर जो आया, राजा ने उसे मनचाहा दिया: हाथी, रथ, घोड़े, सोना, गौएँ, हीरे और अनेक वस्त्र। सब सन्तुष्ट होकर आशीष देते हैं कि तुलसीदास के स्वामी ये सब पुत्र चिरंजीवी हों।

196.1

यह रहस्य काहू नहिँ जाना । दिन-मनि चले करत गुन गाना ॥
देखि महोत्सव सुर मुनि नागा । चले भवन बरनत निज भागा ॥

yaha rahasya kāhū nahim̐ jānā | dina-mani cale karata guna gānā ||
dekhi mahotsava sura muni nāgā | cale bhavana baranata nija bhāgā ||

196.2

औरउ एक कहउँ निज चोरी । सुनु गिरिजा अति दृढ़ मति तोरी ॥
काक भुसुंडि सङ्ग हम दोऊ । मनुज-रूप जानइ नहिँ कोऊ ॥

aurau eka kahaum̐ nija corī | sunu girijā ati dṛr̤ha mati torī ||
kāka bhusuṃḍi saṅga hama doū | manuja-rūpa jānai nahim̐ koū ||

196.3

परमानन्द प्रेम-सुख फूले । बीथिन्ह फिरहिँ मगन मन भूले ॥
यह सुभ चरित जान पै सोई । कृपा राम कै जा पर होई ॥

paramānanda prema-sukha phūle | bīthinha phirahim̐ magana mana bhūle ||
yaha subha carita jāna pai soī | kṛpā rāma kai jā para hoī ||

196.4

तेहि अवसर जो जेहि बिधि आवा । दीन्ह भूप जो जेहि मन भावा ॥
गज रथ तुरग हेम गो हीरा । दीन्हे नृप नाना बिधि चीरा ॥

tehi avasara jo jehi bidhi āvā | dīnha bhūpa jo jehi mana bhāvā ||
gaja ratha turaga hema go hīrā | dīnhe nṛpa nānā bidhi cīrā ||

दो॰ 196दोहा

मन संतोषे सबन्हि के, जहँ तहँ देहिँ असीस ।
सकल तनय चिरजीवहु, तुलसिदास के ईस ॥

mana saṃtoṣe sabanhi ke, jaham̐ taham̐ dehim̐ asīsa |
sakala tanaya cirajīvahu, tulasidāsa ke īsa ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0