बालकाण्ड

अध्याय 192: कौसल्या के सामने प्रभु का प्राकट्य

5 श्लोक · 192 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

कौसल्या के सामने प्रभु का प्राकट्य

ये चार छन्द जन्म की प्रसिद्ध स्तुति हैं। कृपालु प्रभु कौसल्या के हित के लिए प्रकट होते हैं। माता हर्ष से उनका अद्भुत रूप देखती हैं: मेघ के समान श्याम शरीर, सुन्दर नेत्र, चार भुजाओं में आयुध, वक्ष पर वनमाला। वे हाथ जोड़कर कहती हैं, हे अनन्त, आपकी स्तुति कैसे करूँ? आप माया और गुणों से परे हैं, आपके रोम रोम में अनगिनत ब्रह्माण्ड हैं, फिर भी आप मेरे गर्भ में रहे। प्रभु मुस्कराते हैं और पूर्व की कथा सुनाते हैं, जिससे माता उन्हें पुत्र रूप में प्रेम करें। माता की बुद्धि बदलती है; वे कहती हैं, यह रूप छोड़कर शिशुलीला कीजिए। प्रभु तुरन्त नवजात बालक की तरह रोने लगते हैं।

192.छं॰ 1छन्द

भये प्रगट कृपाला, दीनदयाला, कौसल्या-हितकारी ।
हरषित महँतारी, मुनि-मन-हारी, अदभुत रूप बिचारी ॥
लोचन अभिरामा, तनु-घनस्यामा, निज आयुध भुज चारी ।
भूषन बनमाला, नयन बिसाला, सोभा-सिन्धु खरारी ॥

bhaye pragaṭa kṛpālā, dīnadayālā, kausalyā-hitakārī |
haraṣita maham̐tārī, muni-mana-hārī, adabhuta rūpa bicārī ||
locana abhirāmā, tanu-ghanasyāmā, nija āyudha bhuja cārī |
bhūṣana banamālā, nayana bisālā, sobhā-sindhu kharārī ||

192.छं॰ 2छन्द

कह दुइ कर जोरी, अस्तुति तोरी, केहि बिधि करउँ अनन्ता ।
माया-गुन-ज्ञाना,-तीत अमाना, बेद पुरान भनन्ता ॥
करुना-सुख-सागर, सब गुन आगर, जेहि गावहिँ स्त्रुति सन्ता ।
सो मम-हित-लागी, जन-अनुरागी, भयउ प्रगट श्रीकन्ता ॥

kaha dui kara jorī, astuti torī, kehi bidhi karaum̐ anantā |
māyā-guna-jñānā,-tīta amānā, beda purāna bhanantā ||
karunā-sukha-sāgara, saba guna āgara, jehi gāvahim̐ struti santā |
so mama-hita-lāgī, jana-anurāgī, bhayau pragaṭa śrīkantā ||

192.छं॰ 3छन्द

ब्रह्मांड निकाया, निर्मित-माया, रोम रोम प्रति, बेद कहै ।
मम उर सो बासी, यह उपहासी, सुनत धीर मति, थिर न रहै ॥
उपजा जब ज्ञाना, प्रभु मुसकाना, चरित बहुत बिधि, कीन्ह चहै ।
कहि कथा सुहाई, मातु बुझाई, जेहि प्रकार सुत, प्रेम लहै ॥

brahmāṃḍa nikāyā, nirmita-māyā, roma roma prati, beda kahai |
mama ura so bāsī, yaha upahāsī, sunata dhīra mati, thira na rahai ||
upajā jaba jñānā, prabhu musakānā, carita bahuta bidhi, kīnha cahai |
kahi kathā suhāī, mātu bujhāī, jehi prakāra suta, prema lahai ||

192.छं॰ 4छन्द

माता पुनि बोली, सो मति डौली, तजहु तात यह रूपा ।
कीजिय सिसुलीला, अति प्रिय-सोला, यह सुख परम अनूपा ॥
सुनि बचन सुजाना, रोदन ठाना, होइ बालक सुर-भूपा ।
यह चरित जे गावहिँ, हरि पद पावहिँ, ते न परहिँ भव-कूपा ॥

mātā puni bolī, so mati ḍaulī, tajahu tāta yaha rūpā |
kījiya sisulīlā, ati priya-solā, yaha sukha parama anūpā ||
suni bacana sujānā, rodana ṭhānā, hoi bālaka sura-bhūpā |
yaha carita je gāvahim̐, hari pada pāvahim̐, te na parahim̐ bhava-kūpā ||

दो॰ 192दोहा

बिप्र-धेनु-सुर-सन्त हित, लीन्ह मनुज-अवतार ।
निज-इच्छा निर्मित-तनु, माया-गुन-गो पार ॥

bipra-dhenu-sura-santa hita, līnha manuja-avatāra |
nija-icchā nirmita-tanu, māyā-guna-go pāra ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0