बालकाण्ड

अध्याय 193: पुत्र-जन्म सुनकर दशरथ का आनन्द

5 श्लोक · 193 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

पुत्र-जन्म सुनकर दशरथ का आनन्द

शिशु का प्रिय रुदन सुनकर रानियाँ उतावली होकर आती हैं, दासियाँ हर्ष से दौड़ती हैं और सारा नगर आनन्द में मग्न है। पुत्र-जन्म सुनते ही दशरथ को मानो ब्रह्मानन्द मिल जाता है। प्रेम से पुलकित होकर वे अपने को धीर करते हैं और सोचते हैं, जिनका नाम सुनने से ही मंगल होता है, वही प्रभु मेरे घर आए हैं। वे बाजे बजवाने का आदेश देते हैं। गुरु वसिष्ठ ब्राह्मणों सहित आते हैं और उस अनुपम बालक को देखते हैं, जिसके रूप का वर्णन पूरा नहीं होता। नान्दीमुख श्राद्ध करके सब जातकर्म होते हैं और राजा ब्राह्मणों को सोना, गौएँ, वस्त्र और मणियाँ देते हैं।

193.1

सुनि सिसु रुदन परम प्रिय बानी । सम्भ्रम चलि आई सब रानी ॥
हरषित जहँ तहँ धाईँ दासी । आनँद मगन सकल पुरबासी ॥

suni sisu rudana parama priya bānī | sambhrama cali āī saba rānī ||
haraṣita jaham̐ taham̐ dhāīm̐ dāsī | ānam̐da magana sakala purabāsī ||

193.2

दसरथ पुत्र-जन्म सुनि काना । मानहुँ ब्रह्मानन्द समाना ॥
परम-प्रेम-मन पुलक-सरीरा । चाहत उठत करत मति धीरा ॥

dasaratha putra-janma suni kānā | mānahum̐ brahmānanda samānā ||
parama-prema-mana pulaka-sarīrā | cāhata uṭhata karata mati dhīrā ||

193.3

जा कर नाम सुनत सुभ होई । मोरें गृह आवा प्रभु सोई ॥
परमानन्द-पूरि-मन राजा । कहा बोलाइ बजावहु बाजा ॥

jā kara nāma sunata subha hoī | moreṃ gṛha āvā prabhu soī ||
paramānanda-pūri-mana rājā | kahā bolāi bajāvahu bājā ||

193.4

गुरु बसिष्ठ कहँ गयउ हँकारा । आये द्विजन सहित नृप-द्वारा ॥
अनुपम बालक देखेन्हि जाई । रूप-रासि गुन कहि न सिराई ॥

guru basiṣṭha kaham̐ gayau ham̐kārā | āye dvijana sahita nṛpa-dvārā ||
anupama bālaka dekhenhi jāī | rūpa-rāsi guna kahi na sirāī ||

दो॰ 193दोहा

तब नन्दीमुख-सराध करि, जातकरम सब कीन्ह ।
हाटक धेनु बसन मनि, नृप बिप्रन्ह कहँ दीन्ह ॥

taba nandīmukha-sarādha kari, jātakarama saba kīnha |
hāṭaka dhenu basana mani, nṛpa bipranha kaham̐ dīnha ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0