बालकाण्ड

अध्याय 191: रामनवमी की पावन घड़ी

5 श्लोक · 191 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

रामनवमी की पावन घड़ी

पवित्र चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी है और हरि को प्रिय अभिजित मुहूर्त है। दोपहर है, न अधिक ठण्ड न धूप; यह पावन काल लोकों को विश्राम देता है। शीतल, मन्द, सुगन्धित पवन बहता है। वन फूलों से भरे हैं, पर्वत मणियों से चमकते हैं और सब नदियाँ अमृत की धारा बहाती हैं। अवसर जानकर ब्रह्मा और सब देवता विमान सजाकर चलते हैं। निर्मल आकाश देवताओं से भर जाता है; गन्धर्व गुण गाते हैं, अंजलि भर भरकर फूल बरसते हैं और नगाड़े बजते हैं। नाग, मुनि और देवता स्तुति और सेवा करते हैं। विनती करके वे अपने धाम लौटते हैं और सब लोकों को विश्राम देने वाले जगन्निवास प्रभु प्रकट होते हैं।

191.1

नौमी तिथि मधु मास पुनीता । सुकल पच्छ अभिजित हरि-प्रीता ॥
मध्य दिवस अति सीत न घामा । पावन-काल लोक-बिश्रामा ॥

naumī tithi madhu māsa punītā | sukala paccha abhijita hari-prītā ||
madhya divasa ati sīta na ghāmā | pāvana-kāla loka-biśrāmā ||

191.2

सीतल मन्द सुरभि बह बाऊ । हरषित सुर संतन मन चाऊ ॥
बन कुसुमित गिरि-गन-मनिआरा । स्त्रवहिं सकल सरिताऽमृतधारा ॥

sītala manda surabhi baha bāū | haraṣita sura saṃtana mana cāū ||
bana kusumita giri-gana-maniārā | stravahiṃ sakala saritā'mṛtadhārā ||

191.3

सो अवसर बिरज्चि जब जाना । चले सकल सुर साजि विमाना ॥
गगन बिमल सकुल-सुर-जूथा । गावहिँ गुन गन्धर्व-बरूथा ॥

so avasara birajci jaba jānā | cale sakala sura sāji vimānā ||
gagana bimala sakula-sura-jūthā | gāvahim̐ guna gandharva-barūthā ||

191.4

बरषहिँ सुमन सुअञ्जलि साजी । गहगहि गगन दुन्दुभी बाजी ॥
अस्तुति करहिँ नाग-मुनि-देवा । बहु बिधि लावहिँ निज निज सेवा ॥

baraṣahim̐ sumana suañjali sājī | gahagahi gagana dundubhī bājī ||
astuti karahim̐ nāga-muni-devā | bahu bidhi lāvahim̐ nija nija sevā ||

दो॰ 191दोहा

सुर-समूह बिनती करि, पहुँचे निज निज धाम ।
जगनिवास प्रभु प्रगटे, अखिल-लोक-बिस्राम ॥

sura-samūha binatī kari, pahum̐ce nija nija dhāma |
jaganivāsa prabhu pragaṭe, akhila-loka-bisrāma ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0