बालकाण्ड

अध्याय 186: ब्रह्मा द्वारा प्रभु की स्तुति

5 श्लोक · 186 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

ब्रह्मा द्वारा प्रभु की स्तुति

यह समूह ब्रह्मा की छन्दबद्ध स्तुति है, जो वे भयभीत देवताओं और पृथ्वी की ओर से गाते हैं। हे देवताओं के स्वामी, शरणागत के रक्षक, गौ और ब्राह्मण के हितकारी, असुरों के शत्रु, लक्ष्मीपति, आपकी जय हो; आपकी करनी का भेद कोई नहीं जानता। हे अविनाशी, घट घट के वासी, माया से रहित, जिनका ध्यान मुनि दिन रात करते हैं, आपकी जय हो। आपने बिना सहायक के त्रिगुणमयी सृष्टि रची; हम भक्ति और पूजा नहीं जानते, आप ही हमारी चिन्ता कीजिए। शारदा, वेद और शेष भी आपको नहीं जानते; हे दीनों के प्यारे, द्रवित होइए। इस प्रेमभरी प्रार्थना को सुनकर गम्भीर आकाशवाणी होती है, जो शोक और सन्देह हर लेती है।

186.छं॰ 1छन्द

जय जय सुर-नायक, जन सुख-दायक, प्रनतपाल भगवन्ता ।
गो-द्विज-हितकारी, जय असुरारी, सिन्धु-सुता प्रिय कन्ता ॥
पालन सुर धरनी, अदभुत-करनी, मरम न जानइ कोई ।
जो सहज कृपाला, दीनदयाला, करहु अनुग्रह सोई ॥

jaya jaya sura-nāyaka, jana sukha-dāyaka, pranatapāla bhagavantā |
go-dvija-hitakārī, jaya asurārī, sindhu-sutā priya kantā ||
pālana sura dharanī, adabhuta-karanī, marama na jānai koī |
jo sahaja kṛpālā, dīnadayālā, karahu anugraha soī ||

186.छं॰ 2छन्द

जय जय अबिनासी, सन घट बासी, व्यापक परमानन्दा ।
अबिगत गोतीतं, चरित पुनीतं, मायारहित मुकुंदा ॥
जेहि लागि बिरागी, अति अनुरागी, बिगतमोह मुनिवृन्दा ।
निसि बासर ध्यावहिँ, गुन गन गावहिँ, जयति सच्चिदानन्दा ॥

jaya jaya abināsī, sana ghaṭa bāsī, vyāpaka paramānandā |
abigata gotītaṃ, carita punītaṃ, māyārahita mukuṃdā ||
jehi lāgi birāgī, ati anurāgī, bigatamoha munivṛndā |
nisi bāsara dhyāvahim̐, guna gana gāvahim̐, jayati saccidānandā ||

186.छं॰ 3छन्द

जेहिं सृष्टि उपाई, त्रिबिधि बनाई, सङ्ग सहाय न दूजा ।
सो करउ अघारी, चिन्त हमारी, जानिय भगति न पूजा ॥
जो भव-भय भज्जन, मुनि-मन रञ्जन, गञ्जन बिपति बरूथा ।
मन बच क्रम बानी, छाड़ि सयानी, सरन सकल-सुर-जूथा ॥

jehiṃ sṛṣṭi upāī, tribidhi banāī, saṅga sahāya na dūjā |
so karau aghārī, cinta hamārī, jāniya bhagati na pūjā ||
jo bhava-bhaya bhajjana, muni-mana rañjana, gañjana bipati barūthā |
mana baca krama bānī, chār̤i sayānī, sarana sakala-sura-jūthā ||

186.छं॰ 4छन्द

सारद स्त्रुति सेषा, रिषय असेषा, जा कहँ कोउ नहिँ जाना ।
जेहि दीन पिआरे, बेद पुकारे, द्रवउ सो श्रीभगवाना ॥
भव-बारिधि-मन्दर, सब निधि सुन्दर, गुनमंदिर सुखपुंजा ।
मुनि सिद्ध सकल सुर, परम भयातुर, नमत नाथ-पद-कञ्जा ॥

sārada struti seṣā, riṣaya aseṣā, jā kaham̐ kou nahim̐ jānā |
jehi dīna piāre, beda pukāre, dravau so śrībhagavānā ||
bhava-bāridhi-mandara, saba nidhi sundara, gunamaṃdira sukhapuṃjā |
muni siddha sakala sura, parama bhayātura, namata nātha-pada-kañjā ||

दो॰ 186दोहा

जानि सभय सुर-भूमि सुनि, बचन समेत सनेह ।
गगन-गिरा गम्भीर भइ, हरनि सोक-सन्देह ॥

jāni sabhaya sura-bhūmi suni, bacana sameta saneha |
gagana-girā gambhīra bhai, harani soka-sandeha ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0