बालकाण्ड

अध्याय 185: शिवजी का वचन: प्रेम से प्रकट होते हैं प्रभु

5 श्लोक · 185 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

शिवजी का वचन: प्रेम से प्रकट होते हैं प्रभु

देवता विचार करते हैं कि प्रभु को कहाँ पाएँ और कहाँ पुकारें। कोई वैकुण्ठ कहता है, कोई क्षीरसागर। शिवजी गिरिजा से कहते हैं कि उस समाज में मैं भी था और मैंने एक बात कही: हरि सब जगह समान रूप से व्यापक हैं और प्रेम से प्रकट होते हैं। कौन सा देश, काल या दिशा है जहाँ वे नहीं? वे चर अचर में समाए होकर भी सबसे अलग हैं; जैसे लकड़ी से आग प्रकट होती है, वैसे ही प्रेम से प्रभु प्रकट होते हैं। यह बात सबको भाई और ब्रह्मा ने साधु साधु कहा। ब्रह्मा का मन हर्षित हुआ, शरीर पुलकित हुआ, आँखों से आँसू बहे, और वे धीर मन से हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे।

185.1

बैठे सुर सब करहिँ बिचारा । कहँ पाइअ प्रभु करिय पुकारा ॥
पुर बैकुंठ जान कह कोई । कोउ कह पयनिधि बस प्रभु सोई ॥

baiṭhe sura saba karahim̐ bicārā | kaham̐ pāia prabhu kariya pukārā ||
pura baikuṃṭha jāna kaha koī | kou kaha payanidhi basa prabhu soī ||

185.2

जाके हृदयँ भगति जसि प्रीती । प्रभु तहँ प्रगट सदा तेहिं रीती ॥
तेहि समाज गिरिजा मैँ रहेऊँ । अवसर पाइ बचन एक कहेऊँ ॥

jāke hṛdayam̐ bhagati jasi prītī | prabhu taham̐ pragaṭa sadā tehiṃ rītī ||
tehi samāja girijā maim̐ raheūm̐ | avasara pāi bacana eka kaheūm̐ ||

185.3

हरि ब्यापक सर्वत्र समाना । प्रेम तेँ प्रगट होहिँ मैँ जाना ॥
देस काल दिसि बिदिसिहु माहीँ । कहहु से कहाँ जहाँ प्रभु नाहीँ ॥

hari byāpaka sarvatra samānā | prema tem̐ pragaṭa hohim̐ maim̐ jānā ||
desa kāla disi bidisihu māhīm̐ | kahahu se kahām̐ jahām̐ prabhu nāhīm̐ ||

185.4

अग-जग-मय सब रहित बिरागी । प्रेम तेँ प्रभु प्रगटइ जिमि आगी ॥
मोर बचन सब के मन माना । साधु साधु करि ब्रह्म बखाना ॥

aga-jaga-maya saba rahita birāgī | prema tem̐ prabhu pragaṭai jimi āgī ||
mora bacana saba ke mana mānā | sādhu sādhu kari brahma bakhānā ||

दो॰ 185दोहा

सुनि बिरज्चि मन हरषि तन,-पुलकि नयन बह नीर ।
अस्तुति करत जोरि कर, सावधान मति-धीर ॥

suni birajci mana haraṣi tana,-pulaki nayana baha nīra |
astuti karata jori kara, sāvadhāna mati-dhīra ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0