बालकाण्ड

अध्याय 184: गौ रूप धरकर पृथ्वी का ब्रह्मा के पास जाना

6 श्लोक · 184 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

गौ रूप धरकर पृथ्वी का ब्रह्मा के पास जाना

चोर, जुआरी, पराए धन और पराई स्त्री के लोभी बहुत बढ़ जाते हैं; कोई माता, पिता और देवताओं को नहीं मानता। शिवजी भवानी से कहते हैं कि ऐसे आचरण वाले प्राणी राक्षस के समान ही हैं। धर्म की ऐसी हानि देखकर पृथ्वी अत्यन्त भयभीत होती है। वह सोचती है कि पर्वत, नदियाँ और समुद्र मुझे उतने भारी नहीं, जितना एक परद्रोही भारी है। गौ का रूप धरकर वह रोती हुई देवताओं और मुनियों के पास जाती है, पर किसी से कुछ नहीं बनता। सब मिलकर ब्रह्मलोक जाते हैं। ब्रह्मा जानते हैं कि उनका भी बस नहीं चलता। वे कहते हैं, धीरज धरो और हरि के चरणों का स्मरण करो, जिनकी तुम दासी हो; वे अपने जन की पीड़ा जानते हैं और यह विपत्ति मिटाएँगे।

184.1

बाढ़े खल बहु चोर जुआरा । जे लम्पट पर-धन पर-दारा ॥
मानहिँ मातु पिता नहिँ देवा । साधुन्ह सन करवावहिँ सेवा ॥

bār̤he khala bahu cora juārā | je lampaṭa para-dhana para-dārā ||
mānahim̐ mātu pitā nahim̐ devā | sādhunha sana karavāvahim̐ sevā ||

184.2

जिन्ह के यह आचरन भवानी । ते जानेहु निसिचर सम प्रानी ॥
अतिसय देखि धरम कै हानी । परम सभीत धरा अकुलानी ॥

jinha ke yaha ācarana bhavānī | te jānehu nisicara sama prānī ||
atisaya dekhi dharama kai hānī | parama sabhīta dharā akulānī ||

184.3

गिरि सरि सिन्धु भार नहिँ मोही । जस मोहि गरुअ एक पर-द्रोही ॥
सकल धरम देखा बिपरीता । कहि न सकइ रावन भय भीता ॥

giri sari sindhu bhāra nahim̐ mohī | jasa mohi garua eka para-drohī ||
sakala dharama dekhā biparītā | kahi na sakai rāvana bhaya bhītā ||

184.4

धेनु-रूप धरि हृदयँ बिचारी । गई तहाँ जहँ सुर-मुनि-झारी ॥
निज-सन्ताप सुनायेसि रोई । काहूँ तेँ कछु काज न होई ॥

dhenu-rūpa dhari hṛdayam̐ bicārī | gaī tahām̐ jaham̐ sura-muni-jhārī ||
nija-santāpa sunāyesi roī | kāhūm̐ tem̐ kachu kāja na hoī ||

184.छं॰ 1छन्द

सुर मुनि गन्धर्बा, मिलि करि सर्बा, गे बिरज्चि के लोका ।
सँग गा-तनु धारी, भूमि बिचारी, परम बिकल भय सोका ॥
ब्रह्माँ सब जाना, मन अनुमाना, मोर कछू न बसाई ।
जा करि तैँ दासी, सो अबिनासी, हमरेउ तोर सहाई ॥

sura muni gandharbā, mili kari sarbā, ge birajci ke lokā |
sam̐ga gā-tanu dhārī, bhūmi bicārī, parama bikala bhaya sokā ||
brahmām̐ saba jānā, mana anumānā, mora kachū na basāī |
jā kari taim̐ dāsī, so abināsī, hamareu tora sahāī ||

184.सो॰ 184सोरठा

धरनि धरहि मन धीर, कह बिरज्चि हरि-पद सुमिरु ।
जानत जन की पीर, प्रभु भंजिहि दारुन बिपति ॥

dharani dharahi mana dhīra, kaha birajci hari-pada sumiru |
jānata jana kī pīra, prabhu bhaṃjihi dāruna bipati ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0