बालकाण्ड

अध्याय 183: राक्षसों द्वारा धर्म का विनाश

6 श्लोक · 183 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

राक्षसों द्वारा धर्म का विनाश

रावण की आज्ञा तुरन्त पूरी होती है। भयानक रूप वाले निशाचर माया से अनेक रूप धरकर उपद्रव करते हैं और वही करते हैं जिससे धर्म की जड़ कटे और जो वेद के विरुद्ध हो। जहाँ गौ और ब्राह्मण मिलें, उस नगर और गाँव में आग लगा देते हैं। शुभ आचरण कहीं नहीं रहता; देवता, ब्राह्मण और गुरु का कोई मान नहीं करता। न हरिभक्ति है, न यज्ञ, जप और दान; वेद और पुराण सपने में भी सुनाई नहीं देते। जप, योग, तप या यज्ञ की बात सुनते ही रावण स्वयं दौड़कर उसे नष्ट करता है और वेद-पुराण कहने वाले को देश से निकाल देता है। हिंसा-प्रेमी राक्षसों के पाप की कोई सीमा नहीं।

183.1

इन्द्रजीत सन जो कछु कहेऊ । सो सब जनु पहिलेहिं करि रहेऊ ॥
प्रथमहिँ जिन्ह कहँ आयसु दीन्हा । तिन्ह कर चरित सुनहु जो कीन्हा ॥

indrajīta sana jo kachu kaheū | so saba janu pahilehiṃ kari raheū ||
prathamahim̐ jinha kaham̐ āyasu dīnhā | tinha kara carita sunahu jo kīnhā ||

183.2

देखत भीम-रूप सब पापी । निसिचर-निकर देव-परितापी ॥
करहिँ उपद्रव असुर निकाया । नाना रूप धरहिँ करि माया ॥

dekhata bhīma-rūpa saba pāpī | nisicara-nikara deva-paritāpī ||
karahim̐ upadrava asura nikāyā | nānā rūpa dharahim̐ kari māyā ||

183.3

जेहि बिधि होइ धरम-निर्मूला । सो सब करहिँ बेद-प्रतिकूला ॥
जेहिं जेहिं देस धेनु द्विज पावहिँ । नगर गाउँ पुर आगि लगावहिँ ॥

jehi bidhi hoi dharama-nirmūlā | so saba karahim̐ beda-pratikūlā ||
jehiṃ jehiṃ desa dhenu dvija pāvahim̐ | nagara gāum̐ pura āgi lagāvahim̐ ||

183.4

सुभ-आचरन कतहुँ नहिँ होई । देव बिप्र गुरू मान न कोई ॥
नहिँ हरिभगति जज्ञ जप ग्याना । सपनेहुँ सुनिय न बेद पुराना ॥

subha-ācarana katahum̐ nahim̐ hoī | deva bipra gurū māna na koī ||
nahim̐ haribhagati jajña japa gyānā | sapanehum̐ suniya na beda purānā ||

183.छं॰ 1छन्द

जप जोग बिरागा, तप मख-भागा, स्त्रवन सुनइ दससीसा ।
आपुन उठि धावइ, रहइ न पावइ, धरि सब घालइ खीसा ॥
अस भ्रष्ट अचारा, भा संसारा, धरम सुनिय नहिँ काना ।
तेहि बहुबिधि त्रासइ, देस निकासइ, जो कह बेद-पुराना ॥

japa joga birāgā, tapa makha-bhāgā, stravana sunai dasasīsā |
āpuna uṭhi dhāvai, rahai na pāvai, dhari saba ghālai khīsā ||
asa bhraṣṭa acārā, bhā saṃsārā, dharama suniya nahim̐ kānā |
tehi bahubidhi trāsai, desa nikāsai, jo kaha beda-purānā ||

183.सो॰ 183सोरठा

बरनि न जाइ अनीति, घोर निसाचर जो करहिँ ।
हिंसा पर अति प्रीति, तिन्ह के पापहि कवनि मिति ॥

barani na jāi anīti, ghora nisācara jo karahim̐ |
hiṃsā para ati prīti, tinha ke pāpahi kavani miti ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0