अस कहि सब महिदेव सिधाये । समाचार पुरबासिन्ह पाये ॥
सोचहिँ दूषन दैवहिँ देहीँ । बिचरत हंस काग किय जेहीँ ॥
asa kahi saba mahideva sidhāye | samācāra purabāsinha pāye ||
socahim̐ dūṣana daivahim̐ dehīm̐ | bicarata haṃsa kāga kiya jehīm̐ ||
5 श्लोक · 175 में से 361
ऐसा कहकर सब ब्राह्मण चले गए और नगरवासियों को समाचार मिला। वे सोच करते हुए विधाता को दोष देने लगे, जिसने हंस बनाते बनाते कौआ कर दिया। कालकेतु ने पुरोहित को उसके घर पहुँचाया और तपस्वी राजा को खबर दी। उस दुष्ट ने जहाँ तहाँ पत्र भेजे और सब राजा सेना सजाकर आ गए। उन्होंने डंका बजाकर नगर घेर लिया। सब योद्धा वीरता दिखाकर जूझ मरे और राजा भी भाई सहित रणभूमि में गिर पड़े। सत्यकेतु के कुल में कोई न बचा, ब्राह्मण का शाप झूठा कैसे होता? विजयी राजा अपने नगर लौटे। याज्ञवल्क्य कहते हैं, हे भरद्वाज, जिस पर विधाता उलटा हो जाए, उसके लिए धूल सुमेरु के समान, पिता यम के समान और रस्सी साँप के समान हो जाती है।
अस कहि सब महिदेव सिधाये । समाचार पुरबासिन्ह पाये ॥
सोचहिँ दूषन दैवहिँ देहीँ । बिचरत हंस काग किय जेहीँ ॥
asa kahi saba mahideva sidhāye | samācāra purabāsinha pāye ||
socahim̐ dūṣana daivahim̐ dehīm̐ | bicarata haṃsa kāga kiya jehīm̐ ||
उपरोहितहि भवन पहुँचाई । असुर तापसहि खबरि जनाई ॥
तेहिं खल जहँ तहँ पत्र पठाये । सजि सजि सेन भूप सब आये ॥
uparohitahi bhavana pahum̐cāī | asura tāpasahi khabari janāī ||
tehiṃ khala jaham̐ taham̐ patra paṭhāye | saji saji sena bhūpa saba āye ||
घेरेन्हि नगर निसान बजाई । बिबिध भाँति नित होइ लराई ॥
जूझे सकल सुभट करि करनी । बन्धु समेत परेउ नृप धरनी ॥
gherenhi nagara nisāna bajāī | bibidha bhām̐ti nita hoi larāī ||
jūjhe sakala subhaṭa kari karanī | bandhu sameta pareu nṛpa dharanī ||
सत्यकेतु-कुल कोउ नहिँ बाँचा । बिप्र-साप किमि होइ असाँचा ॥
रिपु जिति सब नृप नगर बसाई । निज-पुर गवने जय जस पाई ॥
satyaketu-kula kou nahim̐ bām̐cā | bipra-sāpa kimi hoi asām̐cā ||
ripu jiti saba nṛpa nagara basāī | nija-pura gavane jaya jasa pāī ||
भरद्वाज सुनु जाहि जब, होइ बिधाता बाम ।
धूरि मेरु सम जनक जम, ताहि ब्याल सम दाम ॥
bharadvāja sunu jāhi jaba, hoi bidhātā bāma |
dhūri meru sama janaka jama, tāhi byāla sama dāma ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0