बालकाण्ड

अध्याय 170: कालकेतु, सूअर बना राक्षस

5 श्लोक · 170 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

कालकेतु, सूअर बना राक्षस

आज्ञा मानकर राजा सो गए और वह छल का ज्ञाता अपने आसन पर जा बैठा। थके हुए राजा को गहरी नींद आ गई, पर वह कैसे सोता, उसे बड़ी चिन्ता थी। तभी कालकेतु राक्षस वहाँ आया, जिसने सूअर बनकर राजा को भटकाया था। वह तपस्वी राजा का परम मित्र था। उसके सौ पुत्र और दस भाई थे, जो बड़े दुष्ट, अजेय और देवताओं को दुख देने वाले थे। ब्राह्मणों, सन्तों और देवताओं को दुखी देखकर राजा ने उन सबको पहले ही युद्ध में मार डाला था। उस दुष्ट ने पिछला वैर याद करके तपस्वी राजा से मिलकर सलाह की की। तेजस्वी शत्रु अकेला भी हो तो उसे छोटा नहीं गिनना चाहिए, केवल सिर बचा राहु आज भी सूर्य और चन्द्रमा को दुख देता है।

170.1

सयन कीन्ह नृप आयसु मानी । आसन जाइ बैठ छल-ज्ञानी ॥
श्रमित भूप निद्रा अति आई । सो किमि सोव सोच अधिकाई ॥

sayana kīnha nṛpa āyasu mānī | āsana jāi baiṭha chala-jñānī ||
śramita bhūpa nidrā ati āī | so kimi sova soca adhikāī ||

170.2

कालकेतु निसिचर तहँ आवा । जेहिं सूकर होइ नृपहि भुलावा ॥
परम मित्र तापस-नृप-केरा । जानइ सो अति कपट घनेरा ॥

kālaketu nisicara taham̐ āvā | jehiṃ sūkara hoi nṛpahi bhulāvā ||
parama mitra tāpasa-nṛpa-kerā | jānai so ati kapaṭa ghanerā ||

170.3

तेहि के सत सुत अरु दस भाई । खल अति अजय देव-दुख-दाई ॥
प्रथमहिँ भूप समर सब मारे । बिप्र सन्त सुर देखि दुखारे ॥

tehi ke sata suta aru dasa bhāī | khala ati ajaya deva-dukha-dāī ||
prathamahim̐ bhūpa samara saba māre | bipra santa sura dekhi dukhāre ||

170.4

तेहिं खल पाछिल बयर सँभरा । तापस नृप मिलि मन्त्र बिचारा ॥
जेहि रिपु-छय सोइ रचेन्हि उपाऊ । भावी बस न जान कछु राऊ ॥

tehiṃ khala pāchila bayara sam̐bharā | tāpasa nṛpa mili mantra bicārā ||
jehi ripu-chaya soi racenhi upāū | bhāvī basa na jāna kachu rāū ||

दो॰ 170दोहा

रिपु तेजसी अकेल अपि, लघु करि गनिय न ताहु ।
अजहुँ देत दुख रवि ससिहि, सिर अवसेषित राहु ॥

ripu tejasī akela api, laghu kari ganiya na tāhu |
ajahum̐ deta dukha ravi sasihi, sira avaseṣita rāhu ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0