बालकाण्ड

अध्याय 171: पुरोहित का अपहरण

5 श्लोक · 171 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

पुरोहित का अपहरण

अपने मित्र को देखकर तपस्वी राजा प्रसन्न होकर उठा और गले मिला, फिर मित्र को सारी कथा कह सुनाई। राक्षस प्रसन्न होकर बोला, हे राजन, सुनो, जब तुमने मेरे कहे अनुसार किया, तो अब मैंने शत्रु को साध लिया। चिन्ता छोड़कर सो जाओ, विधाता ने बिना दवा ही रोग मिटा दिया। कुल सहित शत्रु को जड़ से बहाकर चौथे दिन मैं आकर मिलूँगा। तपस्वी राजा को खूब सन्तोष देकर वह महाकपटी और अत्यन्त क्रोधी राक्षस चला। उसने प्रतापभानु को घोड़े सहित क्षण भर में महल पहुँचा दिया। राजा को रानी के पास सुला दिया और घोड़े को अस्तबल में ठीक से बाँध दिया। फिर वह राजा के पुरोहित को उठा ले गया और माया से उसकी बुद्धि फेरकर उसे पहाड़ की खोह में रख दिया।

171.1

तापस नृप निज सखहि निहारी । हरषि मिलेउ उठि भयउ सुखारी ॥
मित्रहि कहि सब कथा सुनाई । जातुधान बोला सुख पाई ॥

tāpasa nṛpa nija sakhahi nihārī | haraṣi mileu uṭhi bhayau sukhārī ||
mitrahi kahi saba kathā sunāī | jātudhāna bolā sukha pāī ||

171.2

अब साधेउँ रिपु सुनहु नरेसा । जौँ तुम्ह कीन्ह मोर उपदेसा ॥
परिहरि सोच रहहु तुम्ह सोई । बिनु औषध बिआधि बिधि खोई ॥

aba sādheum̐ ripu sunahu naresā | jaum̐ tumha kīnha mora upadesā ||
parihari soca rahahu tumha soī | binu auṣadha biādhi bidhi khoī ||

171.3

कुल समेत रिपु-मूल बहाई । चौथे दिवस मिलब मैँ आई ॥
तापस-नृपहि बहुत परितोषी । चला महा कपटी अति रोषी ॥

kula sameta ripu-mūla bahāī | cauthe divasa milaba maim̐ āī ||
tāpasa-nṛpahi bahuta paritoṣī | calā mahā kapaṭī ati roṣī ||

171.4

भानुप्रतापहि बाजि समेता । पहुँचाएसि छन माँझ निकेता ॥
नृपहि नारि पहिँ सयन कराई । हय-गृह बाँधेसि बाजि बनाई ॥

bhānupratāpahi bāji sametā | pahum̐cāesi chana mām̐jha niketā ||
nṛpahi nāri pahim̐ sayana karāī | haya-gṛha bām̐dhesi bāji banāī ||

दो॰ 171दोहा

राजा के उपरोहितहि, हरि लेइ गयउ बहोरि ।
लेइ राखेसि गिरि खोह महँ, मायाँ करि मति भोरि ॥

rājā ke uparohitahi, hari lei gayau bahori |
lei rākhesi giri khoha maham̐, māyām̐ kari mati bhori ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0