बालकाण्ड

अध्याय 159: तपस्वी का रात रुकने का आग्रह

6 श्लोक · 159 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

तपस्वी का रात रुकने का आग्रह

तपस्वी उन्हें अपने आश्रम में ले गया। सूर्यास्त जानकर उसने आसन दिया और कोमल वाणी में बोला, तुम कौन हो, और सुन्दर युवक होकर प्राणों की परवाह किए बिना वन में अकेले क्यों फिरते हो? तुम्हारे चक्रवर्ती के लक्षण देखकर मुझे बड़ी दया आती है। राजा बोले, हे मुनीश्वर, प्रतापभानु नाम के राजा हैं, मैं उनका मन्त्री हूँ। शिकार में फिरते हुए रास्ता भूल गया और बड़े भाग्य से आपके चरणों के दर्शन हुए। मुनि ने कहा, हे तात, अँधेरा हो गया, तुम्हारा नगर सत्तर योजन दूर है। रात घोर है, वन घना है, रास्ता नहीं, आज यहीं रहो, सवेरा होते ही जाना। तुलसीदास कहते हैं, जैसी होनी होती है वैसी ही सहायता मिल जाती है।

159.1

गै स्त्रम सकल सुखी नृप भयऊ । निज आस्त्रम तापस लेइ गयऊ ॥
आसन दीन्ह अस्त रबि जानी । पुनि तापस बोलेउ मृदु बानी ॥

gai strama sakala sukhī nṛpa bhayaū | nija āstrama tāpasa lei gayaū ||
āsana dīnha asta rabi jānī | puni tāpasa boleu mṛdu bānī ||

159.2

को तुम्ह कस बन फिरहु अकेलें । सुन्दर जुबा जीव पर हेले ॥
चक्रवर्ति के लच्छन तोरें । देखत दया लागि अति मोरें ॥

ko tumha kasa bana phirahu akeleṃ | sundara jubā jīva para hele ||
cakravarti ke lacchana toreṃ | dekhata dayā lāgi ati moreṃ ||

159.3

नाम प्रताप-भानु अवनीसा । तासु सचिव मैँ सुनहु मुनीसा ॥
फिरत अहेरें परेउँ भुलाई । बड़े भाग देखउँ पद आई ॥

nāma pratāpa-bhānu avanīsā | tāsu saciva maim̐ sunahu munīsā ||
phirata ahereṃ pareum̐ bhulāī | bar̤e bhāga dekhaum̐ pada āī ||

159.4

हम कहँ दुर्लभ दरस तुम्हारा । जानत हौँ कछु भल होनिहारा ॥
कह मुनि तात भयउ अँधियारा । जोजन सत्तरि नगर तुम्हारा ॥

hama kaham̐ durlabha darasa tumhārā | jānata haum̐ kachu bhala honihārā ||
kaha muni tāta bhayau am̐dhiyārā | jojana sattari nagara tumhārā ||

दो॰ 159 (क)दोहा

निसा-घोर गम्भीर-बन, पन्थ न सुनहु सुजान ।
बसहु आजु अस जानि तुम्ह, जाएहु होत बिहान ॥

nisā-ghora gambhīra-bana, pantha na sunahu sujāna |
basahu āju asa jāni tumha, jāehu hota bihāna ||

दो॰ 159 (ख)दोहा

तुलसी जसि भवतब्यता, तैसी मिलइ सहाइ ।
आपु न आवइ ताहि पहिँ, ताहि तहाँ लेइ जाइ ॥

tulasī jasi bhavatabyatā, taisī milai sahāi |
āpu na āvai tāhi pahim̐, tāhi tahām̐ lei jāi ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0