बालकाण्ड

अध्याय 160: छिपे शत्रु का कपटजाल

5 श्लोक · 160 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

छिपे शत्रु का कपटजाल

हे नाथ, ठीक है, कहकर आज्ञा सिर पर धरकर राजा घोड़े को पेड़ से बाँधकर बैठ गए। फिर कोमल सुहावनी वाणी में बोले, हे प्रभु, आपको पिता जानकर ढिठाई करता हूँ, हे मुनीश, मुझे पुत्र और सेवक जानकर अपना नाम बताइए। राजा ने उसे नहीं पहचाना, पर उसने राजा को पहचान लिया था। राजा सरल हृदय थे और वह कपट में चतुर था। एक तो वैरी, फिर क्षत्रिय, फिर राजा, वह छल बल से अपना काम निकालना चाहता था। उसकी छाती कुम्हार के आँवे सी सुलग रही थी। राजा के सरल वचन सुनकर, वैर याद करके वह मन में प्रसन्न हुआ। कपट में डुबोई कोमल वाणी में युक्ति से बोला, अब मेरा नाम भिखारी है, मैं निर्धन और गृहहीन हूँ।

160.1

भलेहिं नाथ आयसु धरि सीसा । बाँधि तुरग तरु बैठ महीसा ॥
नृप बहु भाँति प्रसंसेउ ताही । चरन बन्दि निज-भाग्य सराही ॥

bhalehiṃ nātha āyasu dhari sīsā | bām̐dhi turaga taru baiṭha mahīsā ||
nṛpa bahu bhām̐ti prasaṃseu tāhī | carana bandi nija-bhāgya sarāhī ||

160.2

पुनि बोले मृदु गिरा सुहाई । जानि पिता प्रभु करउँ ढिठाई ॥
मोहि मुनीस सुत सेवक जानी । नाथ नाम निज कहहु बखानी ॥

puni bole mṛdu girā suhāī | jāni pitā prabhu karaum̐ ḍhiṭhāī ||
mohi munīsa suta sevaka jānī | nātha nāma nija kahahu bakhānī ||

160.3

तेहि न जान नृप नृपहि सो जाना । भूप सुह्रद से कपट सयाना ॥
बैरी पुनि छत्री पुनि राजा । छल बल कीन्ह चहइ निज काजा ॥

tehi na jāna nṛpa nṛpahi so jānā | bhūpa suhrada se kapaṭa sayānā ||
bairī puni chatrī puni rājā | chala bala kīnha cahai nija kājā ||

160.4

समुझि राजसुख दुखित अराती । अवाँ अनल इव सुलगइ छाती ॥
सरल बचन नृप कै सुनि काना । बयर सँभारि हृदयँ हरषाना ॥

samujhi rājasukha dukhita arātī | avām̐ anala iva sulagai chātī ||
sarala bacana nṛpa kai suni kānā | bayara sam̐bhāri hṛdayam̐ haraṣānā ||

दो॰ 160दोहा

कपट बोरि बानी मृदुल, बोलेउ जुगुति समेत ।
नाम हमार भिखारि अब, निर्धन रहित निकेत ॥

kapaṭa bori bānī mṛdula, boleu juguti sameta |
nāma hamāra bhikhāri aba, nirdhana rahita niketa ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0