तुलसीदास उस रूप का वर्णन करते हैं जिसे मनु और शतरूपा ने देखा। शरद पूर्णिमा के चन्द्रमा जैसा मुख, जो शोभा की सीमा है। सुन्दर गाल, ठोड़ी और शंख जैसी रेखाओं वाली ग्रीवा। लाल होठ, सुन्दर दाँत और नासिका, और ऐसी हँसी जो चन्द्रकिरणों को भी लजा दे। नए कमल जैसे नेत्र, मन को भाने वाली चितवन, कामदेव के धनुष जैसी भौहें और ललाट पर चमकता तिलक। कानों में मकराकृत कुण्डल, सिर पर मुकुट, और घुँघराले बाल मानो भौंरों का झुण्ड। वक्ष पर श्रीवत्स, सुन्दर वनमाला, रत्नहार और मणियों के आभूषण। सिंह जैसे कन्धे, सुन्दर जनेऊ, हाथी की सूँड जैसी भुजाएँ, कमर में तरकश और हाथ में धनुष बाण। बिजली को लजाने वाला पीताम्बर, पेट पर तीन सुन्दर रेखाएँ, और नाभि मानो यमुना के भँवर की छवि छीन लेती हो।