प्रभु के चरणकमलों का वर्णन नहीं हो सकता, उनमें मुनियों के मनरूपी भौंरे बसते हैं। प्रभु के बाएँ भाग में सदा अनुकूल रहने वाली, शोभा की निधि और जगत की मूल आदिशक्ति विराजमान थीं, जिनके अंश से गुणों की खान अगणित लक्ष्मी, उमा और ब्रह्माणी उत्पन्न होती हैं और जिनकी भौंह के संकेत से जगत रचा जाता है। वही सीता श्रीराम के वाम भाग में हैं। शोभा के समुद्र हरि का रूप देखकर मनु और शतरूपा पलक रोककर एकटक देखते रहे और तृप्त न हुए। आनन्द के वश वे देह की सुध भूल गए और चरण पकड़कर दण्ड की तरह गिर पड़े। करुणापुंज प्रभु ने अपने करकमलों से उनके सिर छूकर तुरन्त उठा लिया। फिर कृपानिधान बोले, मुझे अत्यन्त प्रसन्न जानो और महादानी समझकर मन को भाने वाला वर माँगो।