बरष सहस-दस त्यागेउ सोऊ । ठाढ़े रहे एक पग दोऊ ॥
विधि हरि तप देखि अपारा । मनु समीप आये बहु बारा ॥
baraṣa sahasa-dasa tyāgeu soū | ṭhār̤he rahe eka paga doū ||
vidhi hari tapa dekhi apārā | manu samīpa āye bahu bārā ||
5 श्लोक · 145 में से 361
दस हजार वर्ष तक उन्होंने वायु भी छोड़ दिया और दोनों एक पैर पर खड़े रहे। यह अपार तप देखकर ब्रह्मा, विष्णु और शिव बहुत बार मनु के पास आए। वे वर का लोभ देते रहे, पर दम्पति न डिगे। शरीर हड्डियों का ढाँचा रह गया, फिर भी मन में तनिक पीड़ा न थी। सर्वज्ञ प्रभु ने तपस्वी राजा रानी को अपना अनन्य दास जाना। तब आकाशवाणी हुई, माँगो, वर माँगो। वह वाणी परम गम्भीर और कृपा के अमृत से सनी थी। मृतक को भी जिला देने वाली वह सुहावनी वाणी कानों के छिद्रों से हृदय में पहुँची, तो उनके शरीर ऐसे हृष्ट पुष्ट हो गए मानो अभी घर से आए हों। अमृत समान वचन सुनकर शरीर पुलकित हुआ, और प्रेम हृदय में न समाया, तब मनु दण्डवत करके बोले।
बरष सहस-दस त्यागेउ सोऊ । ठाढ़े रहे एक पग दोऊ ॥
विधि हरि तप देखि अपारा । मनु समीप आये बहु बारा ॥
baraṣa sahasa-dasa tyāgeu soū | ṭhār̤he rahe eka paga doū ||
vidhi hari tapa dekhi apārā | manu samīpa āye bahu bārā ||
माँगहु बर बहु भाँति लोभाये । परम धीर नहिँ चलहिँ चलाये ॥
अस्थि–मात्र होइ रहे सरीरा । तदपि मनाग मनहिँ नहिँ पीरा ॥
mām̐gahu bara bahu bhām̐ti lobhāye | parama dhīra nahim̐ calahim̐ calāye ||
asthi–mātra hoi rahe sarīrā | tadapi manāga manahim̐ nahim̐ pīrā ||
प्रभु सर्बज्ञ दास निज जानी । गति अनन्य तापस नृप-रानी ॥
माँगु माँगु बर भइ नभ बानी । परम गभीर कृपामृत सानी ॥
prabhu sarbajña dāsa nija jānī | gati ananya tāpasa nṛpa-rānī ||
mām̐gu mām̐gu bara bhai nabha bānī | parama gabhīra kṛpāmṛta sānī ||
मृतक जिआवनि गिरा सुहाई । श्रबन रन्ध्र होइ उर जब आई ॥
ह्रष्टपुष्ट तन भये सुहाये । मानहुँ अबहिँ भवन तैँ आये ॥
mṛtaka jiāvani girā suhāī | śrabana randhra hoi ura jaba āī ||
hraṣṭapuṣṭa tana bhaye suhāye | mānahum̐ abahim̐ bhavana taim̐ āye ||
स्त्रवन सुधा-सम बचन सुनि, पुलक प्रफुल्लित गात ।
बोले मनु करि दंडवत, प्रेम न हृदयँ समात ॥
stravana sudhā-sama bacana suni, pulaka praphullita gāta |
bole manu kari daṃḍavata, prema na hṛdayam̐ samāta ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0