बालकाण्ड

अध्याय 133: स्वयंवर में कुरूप मुख

5 श्लोक · 133 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

स्वयंवर में कुरूप मुख

प्रभु समझाते हैं कि रोग से व्याकुल रोगी कुपथ्य माँगे, तो वैद्य उसे नहीं देता, हे योगी मुनि, इसी प्रकार मैंने तुम्हारा हित ठान लिया है। ऐसा कहकर प्रभु अन्तर्धान हो गए। माया के वश मुनि हरि की गूढ़ वाणी न समझ सके। वे तुरन्त स्वयंवर भूमि में पहुँचे। राजा सज धजकर अपने आसनों पर बैठे थे। मुनि मन में प्रसन्न थे कि मेरा रूप इतना सुन्दर है, मुझे छोड़कर वह भूल से भी किसी और को नहीं वरेगी। मुनि के हित के लिए कृपानिधान ने उन्हें ऐसा कुरूप बना दिया था जिसका वर्णन नहीं हो सकता। यह भेद किसी ने न देखा। वहाँ शिवजी के दो गण थे, जो सब भेद जानते थे और ब्राह्मण वेष में घूम रहे थे।

133.1

कुपथ माँग रुज व्याकुल रोगी । बैद न देइ सुनहु मुनि जोगी ॥
एहि बिधि हित तुम्हार मैँ ठयऊ । कहि अस अन्तरहित प्रभु भयऊ ॥

kupatha mām̐ga ruja vyākula rogī | baida na dei sunahu muni jogī ||
ehi bidhi hita tumhāra maim̐ ṭhayaū | kahi asa antarahita prabhu bhayaū ||

133.2

माया बिबस भये मुनि मूढ़ा । समुझी नहिँ हरि गिरा निगूढ़ा ॥
गवने तुरत तहाँ रिषिराई । जहाँ स्वयम्बर-भूमि बनाई ॥

māyā bibasa bhaye muni mūr̤hā | samujhī nahim̐ hari girā nigūr̤hā ||
gavane turata tahām̐ riṣirāī | jahām̐ svayambara-bhūmi banāī ||

133.3

निज निज आसन बैठे राजा । बहु बनाव करि सहित समाजा ॥
मुनि मन हरष रूप अति मोरें । मोहि तजि आनहिँ बारिहि न भोरें ॥

nija nija āsana baiṭhe rājā | bahu banāva kari sahita samājā ||
muni mana haraṣa rūpa ati moreṃ | mohi taji ānahim̐ bārihi na bhoreṃ ||

133.4

मुनि हित कारन कृपानिधाना । दीन्ह कुरूप न जाइ बखाना ॥
सो चरित्र लखि काहु न पावा । नारद जानि सबहिँ सिर नावा ॥

muni hita kārana kṛpānidhānā | dīnha kurūpa na jāi bakhānā ||
so caritra lakhi kāhu na pāvā | nārada jāni sabahim̐ sira nāvā ||

दो॰ 133दोहा

रहे तहाँ दुइ रुद्र गन, ते जानहिँ सब भेउ ।
बिप्र बेष देखत फिरहिँ, परम कौतुकी तेउ ॥

rahe tahām̐ dui rudra gana, te jānahim̐ saba bheu |
bipra beṣa dekhata phirahim̐, parama kautukī teu ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0