जेहि समाज बैठे मुनि जाई । हृदयँ रूप अहमिति अधिकाई ॥
तहँ बैठ महेस गन दोऊ । बिप्र बेष गति लखइ न कोऊ ॥
jehi samāja baiṭhe muni jāī | hṛdayam̐ rūpa ahamiti adhikāī ||
taham̐ baiṭha mahesa gana doū | bipra beṣa gati lakhai na koū ||
5 श्लोक · 134 में से 361
नारद जिस समाज में जाकर बैठे, उनके हृदय में अपने रूप का अहंकार और बढ़ गया। वहीं ब्राह्मण वेष में शिवजी के दोनों गण बैठे थे। वे नारद को सुनाकर व्यंग्य करने लगे कि हरि ने इन्हें बड़ी अच्छी सुन्दरता दी है, इनकी छवि देखकर राजकुमारी रीझ जाएगी और इन्हें हरि समझकर विशेष रूप से इन्हीं को वरेगी। मुनि का मन मोह से पराए हाथ में था, यह देख शिवगण हँसते थे। मुनि उनकी अटपटी बातें सुनते तो थे, पर बुद्धि भ्रम में सनी थी, इससे कुछ समझ न पाए। वह विशेष चरित किसी ने नहीं देखा, केवल राजकन्या ने वह रूप देखा, वानर का मुख और भयंकर शरीर, जिसे देखते ही उसके हृदय में क्रोध हुआ। तब कुमारी सखियों सहित, हाथ में जयमाला लिए, राजहंसिनी सी चली।
जेहि समाज बैठे मुनि जाई । हृदयँ रूप अहमिति अधिकाई ॥
तहँ बैठ महेस गन दोऊ । बिप्र बेष गति लखइ न कोऊ ॥
jehi samāja baiṭhe muni jāī | hṛdayam̐ rūpa ahamiti adhikāī ||
taham̐ baiṭha mahesa gana doū | bipra beṣa gati lakhai na koū ||
करहिँ कूटि नारदहि सुनाई । नीकि दीन्हि हरि सुन्दरताई ॥
रीझहि राजकुअँरि छवि देखी । इन्हहिँ बरिहि हरि जानि बिसेखी ॥
karahim̐ kūṭi nāradahi sunāī | nīki dīnhi hari sundaratāī ||
rījhahi rājakuam̐ri chavi dekhī | inhahim̐ barihi hari jāni bisekhī ||
मुनिहि मोह मन हाथ पराये । हँसहिँ सम्भु-गन अति सचु पाये ॥
जदपि सुनहिँ मुनि अटपटि बानी । समुझि न परइ बुद्धि भ्रम सानी ॥
munihi moha mana hātha parāye | ham̐sahim̐ sambhu-gana ati sacu pāye ||
jadapi sunahim̐ muni aṭapaṭi bānī | samujhi na parai buddhi bhrama sānī ||
काहु न लखा सो चरित बिसेखा । सो सरूप नृप कन्या देखा ॥
मर्कट बदन भयङ्कर देही । देखत हृदयँ क्रोध भा तेही ॥
kāhu na lakhā so carita bisekhā | so sarūpa nṛpa kanyā dekhā ||
markaṭa badana bhayaṅkara dehī | dekhata hṛdayam̐ krodha bhā tehī ||
सखीं सङ्ग लेइ कुअँरि तब, चलि जनु राजमराल ।
देखत फिरइ महीप सब, कर सरोज जयमाल ॥
sakhīṃ saṅga lei kuam̐ri taba, cali janu rājamarāla |
dekhata phirai mahīpa saba, kara saroja jayamāla ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0