बालकाण्ड

अध्याय 131: राजकुमारी पर नारद का मोह

5 श्लोक · 131 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

राजकुमारी पर नारद का मोह

उसका रूप देखकर मुनि वैराग्य भूल गए और बड़ी देर तक उसे निहारते रहे। उसके लक्षण देखकर वे अपने को भूल गए। हृदय में हर्ष हुआ, पर प्रकट नहीं किया। लक्षण कहते थे कि जो इसे ब्याहेगा वह अमर होगा, रणभूमि में उसे कोई न जीत सकेगा और चराचर सब उसकी सेवा करेंगे। सब लक्षणों को मन में रखकर मुनि ने राजा से कुछ गढ़ी हुई बातें कहीं और कन्या को सुलक्षणा बताकर चिन्ता में डूबे चले गए। वे सोचने लगे कि जाकर ऐसा उपाय करूँ जिससे कुमारी मुझे ही वरे। इस समय जप तप से कुछ न होगा, हे विधाता, यह बाला किस विधि मिलेगी? उन्होंने निश्चय किया कि इस अवसर पर बड़ी शोभा और विशाल रूप चाहिए, जिसे देखकर राजकुमारी रीझे और जयमाला डाल दे।

131.1

देखि रूप मुनि बिरति बिसारी । बड़ी बार लगि रहे निहारी ॥
लच्छन तासु बिलोकि भुलाने । हृदयँ हरष नहिँ प्रगट बखाने ॥

dekhi rūpa muni birati bisārī | bar̤ī bāra lagi rahe nihārī ||
lacchana tāsu biloki bhulāne | hṛdayam̐ haraṣa nahim̐ pragaṭa bakhāne ||

131.2

जो एहि बरइ अमर सोइ होई । समर भूमि तेहि जीत न कोई ॥
सेवहिँ सकल चराचर ताही । बरइ सीलनिधि कन्या जाही ॥

jo ehi barai amara soi hoī | samara bhūmi tehi jīta na koī ||
sevahim̐ sakala carācara tāhī | barai sīlanidhi kanyā jāhī ||

131.3

लच्छन सब बिचारि उर राखे । कछुक बनाइ भूप सन भाखे ॥
सुता सुलच्छन कहि नृप पाहीँ । नारद चले सोच मन माहीँ ॥

lacchana saba bicāri ura rākhe | kachuka banāi bhūpa sana bhākhe ||
sutā sulacchana kahi nṛpa pāhīm̐ | nārada cale soca mana māhīm̐ ||

131.4

करउँ जाइ सोइ जतन बिचारी । जेहि प्रकार मोहि बरइ कुमारी ॥
जप तप कछु न होइ तेहि काला । हे बिधि मिलइ कवन बिधि बाला ॥

karaum̐ jāi soi jatana bicārī | jehi prakāra mohi barai kumārī ||
japa tapa kachu na hoi tehi kālā | he bidhi milai kavana bidhi bālā ||

दो॰ 131दोहा

एहि अवसर चाहिय परम, सोभा रूप बिसाल ।
जो बिलोकि रीझै कुँअरि, तब मेलै जयमाल ॥

ehi avasara cāhiya parama, sobhā rūpa bisāla |
jo biloki rījhai kum̐ari, taba melai jayamāla ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0