कामदेव जब उस आश्रम में पहुँचा, तब उसने अपनी माया से वसन्त ऋतु रच दी। अनेक रंगों के वृक्ष फूलों से लद गए, कोयलें कूकने लगीं और भौंरे गुंजार करने लगे। शीतल, मन्द, सुगन्धित पवन चलने लगा, जो काम की अग्नि को भड़काता था। रम्भा आदि नवयुवती अप्सराएँ, जो कामकला में निपुण थीं, तानों की लहरें भरकर गाने लगीं और हाथों में गेंद लेकर खेलने लगीं। सहायकों को देखकर कामदेव प्रसन्न हुआ और उसने और भी अनेक प्रपंच रचे। परन्तु उसकी कोई भी कला मुनि पर नहीं चली, और पापी कामदेव अपने ही लिए डर गया। जिसके रखवाले स्वयं लक्ष्मीपति हों, उसकी सीमा कौन दबा सकता है? हार मानकर कामदेव सहायकों सहित भयभीत होकर मुनि के चरणों में गिर पड़ा और दीन वचन कहने लगा।