हिम गिरि गुहा एक अति पावनि । बह समीप सुरसरी सुहावनि ॥
आस्त्रम परम पुनीत सुहावा । देखि देवरिषि मन अति भावा ॥
hima giri guhā eka ati pāvani | baha samīpa surasarī suhāvani ||
āstrama parama punīta suhāvā | dekhi devariṣi mana ati bhāvā ||
5 श्लोक · 125 में से 361
शिवजी नारद की कथा आरम्भ करते हैं। हिमालय में एक अत्यन्त पवित्र गुफा थी, पास ही सुहावनी गंगा बहती थीं और वहाँ परम पुनीत आश्रम था। पर्वत, नदी और वन को देखकर देवर्षि के मन में लक्ष्मीपति के चरणों का प्रेम उमड़ा। हरि का स्मरण करते ही उस शाप की गति रुक गई जिससे वे कहीं ठहर नहीं पाते थे, और उनका निर्मल मन समाधि में लग गया। यह देखकर इन्द्र डर गए। उन्होंने कामदेव का सम्मान करके उसे सहायकों सहित भेजा, क्योंकि उन्हें भय था कि देवर्षि उनका पुर चाहते हैं। शिवजी कहते हैं कि कामी और लोभी लोग कौए की तरह सबसे डरते हैं। जैसे मूर्ख कुत्ता सिंह को देखकर सूखी हड्डी लेकर भागता है कि कहीं वह छीन न ले, वैसे ही इन्द्र को लाज न आई।
हिम गिरि गुहा एक अति पावनि । बह समीप सुरसरी सुहावनि ॥
आस्त्रम परम पुनीत सुहावा । देखि देवरिषि मन अति भावा ॥
hima giri guhā eka ati pāvani | baha samīpa surasarī suhāvani ||
āstrama parama punīta suhāvā | dekhi devariṣi mana ati bhāvā ||
निरखि सैल सरि बिपिन विभागा । भयउ रमापति-पद अनुरागा ॥
सुमिरत हरिहि साप गति बाधी । सहज बिमल मन लागि समाधी ॥
nirakhi saila sari bipina vibhāgā | bhayau ramāpati-pada anurāgā ||
sumirata harihi sāpa gati bādhī | sahaja bimala mana lāgi samādhī ||
मुनि गति देखि सुरेस डेराना । कामहिँ बोलि कीन्ह सनमाना ॥
सहित सहाय जाहु मम हेतू । चलेउ हरषि हियँ जलचर केतू ॥
muni gati dekhi suresa ḍerānā | kāmahim̐ boli kīnha sanamānā ||
sahita sahāya jāhu mama hetū | caleu haraṣi hiyam̐ jalacara ketū ||
सुनासीर मन महँ असि त्रासा । चहत देवरिषि मम पुर बासा ॥
जे कामी लोलुप जग माहीँ । कुटिल काक इव सबहि डेराहीँ ॥
sunāsīra mana maham̐ asi trāsā | cahata devariṣi mama pura bāsā ||
je kāmī lolupa jaga māhīm̐ | kuṭila kāka iva sabahi ḍerāhīm̐ ||
सुख हाड़ लेइ भाग सठ, स्वान निरखि मृगराज ।
छीनि लेइ जनि जानि जड़, तिमि सुरपतिहि न लाज ॥
sukha hār̤a lei bhāga saṭha, svāna nirakhi mṛgarāja |
chīni lei jani jāni jar̤a, timi surapatihi na lāja ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0