सोइ जस गाइ भगत भव तरहीँ । कृपासिन्धु जन-हित तनु धरहीँ ॥
राम-जनम के हेतु अनेका । परम बिचित्र एक तेँ एका ॥
soi jasa gāi bhagata bhava tarahīm̐ | kṛpāsindhu jana-hita tanu dharahīm̐ ||
rāma-janama ke hetu anekā | parama bicitra eka tem̐ ekā ||
5 श्लोक · 122 में से 361
प्रभु का यही यश गाकर भक्त भवसागर से पार होते हैं, और भक्तों के हित के लिए ही कृपासिन्धु शरीर धारण करते हैं। शिवजी कहते हैं कि श्रीराम के जन्म के कारण अनेक हैं, एक से बढ़कर एक विचित्र, और भवानी से सावधान होकर एक दो जन्मों की कथा सुनने को कहते हैं। हरि के दो प्रिय द्वारपाल जय और विजय ब्राह्मण के शाप से तामसी असुर बने, हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष। उन्होंने इन्द्र का भी मद चूर किया। प्रभु ने वराह रूप धरकर एक को मारा और नरसिंह बनकर दूसरे को, जिससे भक्त प्रह्लाद का यश फैला। वही दोनों आगे चलकर देवताओं को जीतने वाले महाबली राक्षस कुम्भकर्ण और रावण बने।
सोइ जस गाइ भगत भव तरहीँ । कृपासिन्धु जन-हित तनु धरहीँ ॥
राम-जनम के हेतु अनेका । परम बिचित्र एक तेँ एका ॥
soi jasa gāi bhagata bhava tarahīm̐ | kṛpāsindhu jana-hita tanu dharahīm̐ ||
rāma-janama ke hetu anekā | parama bicitra eka tem̐ ekā ||
जनम एक दुइ कहउँ बखानी । सावधान सुनु सुमति भवानी ॥
द्वारपाल हरि के प्रिय दोऊ । जय अरु बिजय जान सब कोऊ ॥
janama eka dui kahaum̐ bakhānī | sāvadhāna sunu sumati bhavānī ||
dvārapāla hari ke priya doū | jaya aru bijaya jāna saba koū ||
बिन साप तेँ दूनउँ भाई । तामस असुर देह तिन्ह पाई ॥
कनककसिपु अरु हाटक लोचन । जगत बिदित सुरपति मद-मोचन ॥
bina sāpa tem̐ dūnaum̐ bhāī | tāmasa asura deha tinha pāī ||
kanakakasipu aru hāṭaka locana | jagata bidita surapati mada-mocana ||
बिजई समर बीर बिख्याता । धरि बराह बपु एक निपाता ॥
होइ नरहरि दूसर पुनि मारा । जन प्रहलाद सुजस विस्तारा ॥
bijaī samara bīra bikhyātā | dhari barāha bapu eka nipātā ||
hoi narahari dūsara puni mārā | jana prahalāda sujasa vistārā ||
भये निसाचर जाइ तेइ, महाबीर बलवान ।
कुम्भकरन रावन, सुभट, सुर-बिजई जग जान ॥
bhaye nisācara jāi tei, mahābīra balavāna |
kumbhakarana rāvana, subhaṭa, sura-bijaī jaga jāna ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0