बालकाण्ड

अध्याय 120: निराकार ने नरतन क्यों धरा

8 श्लोक · 120 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

निराकार ने नरतन क्यों धरा

पार्वती बोलीं, चन्द्रमा की किरणों जैसी आपकी वाणी सुनकर मेरे मोह रूपी शरद का कठोर ताप मिट गया। आपने कृपा करके मेरा संशय हर लिया, अब श्रीराम का स्वरूप समझ में आया। यद्यपि मैं स्वभाव से जड़ और अज्ञानी स्त्री हूँ, फिर भी अब मुझे अपनी दासी जानिए। यदि आप प्रसन्न हैं तो जो पहले पूछा वही कहिए। श्रीराम ब्रह्म, चिन्मय और अविनाशी हैं, सबसे अलग होकर भी सबके हृदय में बसते हैं, फिर उन्होंने मनुष्य शरीर किस कारण धारण किया? हे वृषकेतु, मुझे समझाकर कहिए। उमा के विनीत वचन सुनकर शंकर हर्षित हुए और बोले, हे भवानी, निर्मल रामचरितमानस की कथा सुनो, जिसे भुशुण्डि ने कहा और पक्षिराज गरुड़ ने सुना। अपनी बुद्धि के अनुसार श्रीराम के अवतार और उनके निष्पाप सुन्दर चरित कहता हूँ।

120.1

ससि-कर सम सुनि गिरा तुम्हारी । मिटा मोह सरदातप भारी ॥
तुम्ह कृपाल मम संसय हरेऊ । राम-सरूप जानि मोहि परेऊ ॥

sasi-kara sama suni girā tumhārī | miṭā moha saradātapa bhārī ||
tumha kṛpāla mama saṃsaya hareū | rāma-sarūpa jāni mohi pareū ||

120.2

नाथ कृपाँ अब गयउ बिषादा । सुखी भयउँ प्रभु-चरन-प्रसादा ॥
अब मोहि आपनि किङ्करि जानी । जदपि सहज जड़ नारि अयानी ॥

nātha kṛpām̐ aba gayau biṣādā | sukhī bhayaum̐ prabhu-carana-prasādā ||
aba mohi āpani kiṅkari jānī | jadapi sahaja jar̤a nāri ayānī ||

120.3

प्रथम जो मैँ पूछा सोइ कहहू । जौँ मो पर प्रसन्न प्रभु अहहू ॥
राम ब्रह्म चिनमय अबिनासी । सर्व रहित सब उर-पुर वासी ॥

prathama jo maim̐ pūchā soi kahahū | jaum̐ mo para prasanna prabhu ahahū ||
rāma brahma cinamaya abināsī | sarva rahita saba ura-pura vāsī ||

120.4

नाथ धरेउ नर तनु केहि हेतू । मोहि समुझाइ कहहु बृषकेतू ॥
उमा बचन सुनि परम बिनीता । राम कथा पर प्रीति पुनीता ॥

nātha dhareu nara tanu kehi hetū | mohi samujhāi kahahu bṛṣaketū ||
umā bacana suni parama binītā | rāma kathā para prīti punītā ||

दो॰ 120 (क)दोहा

हिंयँ हरषे कामारि तब, सङ्कर सहज सुजान ।
बहु विधि उमहिँ प्रसंसि पुनि, बोले कृपानिधान ॥

hiṃyam̐ haraṣe kāmāri taba, saṅkara sahaja sujāna |
bahu vidhi umahim̐ prasaṃsi puni, bole kṛpānidhāna ||

120.सो॰ 120 (ख)सोरठा

सुनु सुभ-कथा भवानि, रामचरितमानस बिमल ।
कहा भुसुंडि बखानि, सुना बिहग-नायक गरुड़ ॥

sunu subha-kathā bhavāni, rāmacaritamānasa bimala |
kahā bhusuṃḍi bakhāni, sunā bihaga-nāyaka garur̤a ||

120.सो॰ 120 (ग)सोरठा

सो सम्बाद उदार, जेहि बिधि भा आगें कहब ।
सुनहु राम अवतार, चरित परम सुन्दर अनघ ॥

so sambāda udāra, jehi bidhi bhā āgeṃ kahaba |
sunahu rāma avatāra, carita parama sundara anagha ||

120.सो॰ 120 (घ)सोरठा

हरि गुन नाम अपार, कथा रूप अगनित अमित ।
मैं निज मति अनुसार, कहउँ उमा सादर सुनहु । घ ॥

hari guna nāma apāra, kathā rūpa aganita amita |
maiṃ nija mati anusāra, kahaum̐ umā sādara sunahu | gha ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0