बालकाण्ड

अध्याय 117: भ्रम देखने वाले में, राम में नहीं

5 श्लोक · 117 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

भ्रम देखने वाले में, राम में नहीं

शिव बोले, अज्ञानी अपना भ्रम नहीं समझते और मूर्ख प्राणी प्रभु पर मोह का आरोप करते हैं, जैसे आकाश में बादलों का परदा देखकर कुविचारी कहते हैं कि सूर्य ढक गया। हे उमा, श्रीराम के विषय में मोह वैसा ही है जैसे आकाश में अन्धकार, धुआँ और धूल दिखते हैं। विषय, इन्द्रियाँ, इन्द्रियों के देवता और जीव, ये सब एक से एक चेतन होते हैं। इन सबका परम प्रकाशक जो है, वही अनादि अवधपति श्रीराम हैं। जगत प्रकाश्य है और श्रीराम प्रकाशक हैं, वे माया के स्वामी हैं। उनकी सत्यता से जड़ माया भी मोह की सहायता से सत्य जैसी भासती है। जैसे सीप में चाँदी और सूर्य की किरणों में जल भासता है, यद्यपि वह तीनों कालों में झूठ है, फिर भी उस भ्रम को कोई हटा नहीं सकता।

117.1

निज भ्रम नहिँ समुझहिँ अज्ञानी । प्रभु पर मोह धरहिँ जड़ प्रानी ॥
जथा गगन घन पटल निहारी । झाँपेउ भानु कहहिँ कुबिचारी ॥

nija bhrama nahim̐ samujhahim̐ ajñānī | prabhu para moha dharahim̐ jar̤a prānī ||
jathā gagana ghana paṭala nihārī | jhām̐peu bhānu kahahim̐ kubicārī ||

117.2

चितव जो लोचन अङ्गुलि लाये । प्रगट जुगल ससि तेहि के भाये ॥
उमा राम-बिषइक अस मोहा । नभ तम-धूम-धूरि जिमि सोहा ॥

citava jo locana aṅguli lāye | pragaṭa jugala sasi tehi ke bhāye ||
umā rāma-biṣaika asa mohā | nabha tama-dhūma-dhūri jimi sohā ||

117.3

विषय करन सुर जीव समेता । सकल एक तेँ एक सचेता ॥
सब कर परम-प्रकासक जोई । राम अनादि अवधपति सोई ॥

viṣaya karana sura jīva sametā | sakala eka tem̐ eka sacetā ||
saba kara parama-prakāsaka joī | rāma anādi avadhapati soī ||

117.4

जगत प्रकास्य प्रकासक रामू । मायाधीस ज्ञान-गुन-धामू ॥
जासु सत्यता तेँ जड़ माया । भास सत्य इव मोह सहाया ॥

jagata prakāsya prakāsaka rāmū | māyādhīsa jñāna-guna-dhāmū ||
jāsu satyatā tem̐ jar̤a māyā | bhāsa satya iva moha sahāyā ||

दो॰ 117दोहा

रजत सीप महँ मास जिमि, जथा भानु-कर-वारि ।
जदपि मृषा तिहुँ काल सोइ, भ्रम न सकइ कोउ टारि ॥

rajata sīpa maham̐ māsa jimi, jathā bhānu-kara-vāri |
jadapi mṛṣā tihum̐ kāla soi, bhrama na sakai kou ṭāri ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0