एहि बिधि जग हरि आश्रित रहई । जदपि असत्य देत दुख अहई ॥
जौँ सपनें सिर काटै कोई । बिनु जागें न दूरि दुख होई ॥
ehi bidhi jaga hari āśrita rahaī | jadapi asatya deta dukha ahaī ||
jaum̐ sapaneṃ sira kāṭai koī | binu jāgeṃ na dūri dukha hoī ||
5 श्लोक · 118 में से 361
शिव बोले, इसी प्रकार जगत हरि के आश्रित रहता है, और यद्यपि असत्य है, फिर भी दुःख देता है। जैसे सपने में कोई सिर काट ले, तो बिना जागे वह दुःख नहीं मिटता। हे गिरिजा, जिनकी कृपा से ऐसा भ्रम मिट जाता है, वही कृपालु रघुराई हैं। जिनका आदि और अन्त किसी ने नहीं पाया, वेद बुद्धि से अनुमान करके ऐसा गाते हैं। वे बिना पैर चलते हैं, बिना कान सुनते हैं, बिना हाथ नाना कर्म करते हैं, बिना मुख सब रसों का भोग करते हैं। उनकी करनी सब प्रकार अलौकिक है, उनकी महिमा कही नहीं जा सकती। जिन्हें वेद और पण्डित ऐसे गाते हैं और मुनि जिनका ध्यान धरते हैं, वही भक्तों के हितकारी दशरथनन्दन, कोसलपति भगवान हैं।
एहि बिधि जग हरि आश्रित रहई । जदपि असत्य देत दुख अहई ॥
जौँ सपनें सिर काटै कोई । बिनु जागें न दूरि दुख होई ॥
ehi bidhi jaga hari āśrita rahaī | jadapi asatya deta dukha ahaī ||
jaum̐ sapaneṃ sira kāṭai koī | binu jāgeṃ na dūri dukha hoī ||
जासु कृपाँ अस भ्रम मिटि जाई । गिरिजा सोइ कृपालु रघुराई ॥
आदि अन्त कोउ जासु न पावा । मति अनुमानि निगम अस गावा ॥
jāsu kṛpām̐ asa bhrama miṭi jāī | girijā soi kṛpālu raghurāī ||
ādi anta kou jāsu na pāvā | mati anumāni nigama asa gāvā ||
बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना । कर बिनु करम करइ विधि नाना ॥
आनन रहित सकल-रस-भोगी । बिनु बानी बकता बड़ जोगी ॥
binu pada calai sunai binu kānā | kara binu karama karai vidhi nānā ||
ānana rahita sakala-rasa-bhogī | binu bānī bakatā bar̤a jogī ||
तन बिनु परस नयन बिनु देखा । ग्रहइ घ्रान बिनु बास असेखा ॥
असि सब भाँति अलौकिक करनी । महिमा जासु जाइ नहिँ बरनी ॥
tana binu parasa nayana binu dekhā | grahai ghrāna binu bāsa asekhā ||
asi saba bhām̐ti alaukika karanī | mahimā jāsu jāi nahim̐ baranī ||
जेहि इमि गावहिँ बेद बुध, जाहि धरहिँ मुनि ध्यान ।
सोइ दसरथ-सुत भगत-हित, कोसलपति-भगवान ॥
jehi imi gāvahim̐ beda budha, jāhi dharahim̐ muni dhyāna |
soi dasaratha-suta bhagata-hita, kosalapati-bhagavāna ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0