मैँ जाना तुम्हार गुन सीला । कहउँ सुनहु अब रघुपति-लीला ॥
सुनु मुनि आजु समागम तोरें । कहि न जाइ जस सुख मन मोरें ॥
maim̐ jānā tumhāra guna sīlā | kahaum̐ sunahu aba raghupati-līlā ||
sunu muni āju samāgama toreṃ | kahi na jāi jasa sukha mana moreṃ ||
5 श्लोक · 105 में से 361
याज्ञवल्क्य बोले, मैंने तुम्हारे गुण और शील जान लिए, अब रघुपति की लीला सुनो। आज तुम्हारे समागम से जो सुख है, वह कहा नहीं जा सकता। रामचरित अपार है, सौ करोड़ शेष भी उसे नहीं कह सकते। फिर भी वाणी के स्वामी, धनुर्धारी प्रभु का स्मरण करके जैसा सुना है वैसा कहता हूँ। शारदा कठपुतली हैं और अन्तर्यामी श्रीराम सूत्रधार हैं। जिस पर वे अपना जन जानकर कृपा करते हैं, उस कवि के हृदय रूपी आँगन में वाणी को नचाते हैं। उन्हीं कृपालु रघुनाथ को प्रणाम करके मुनि कैलास से आरम्भ करते हैं, जो पर्वतों में श्रेष्ठ और अत्यन्त रमणीय है, जहाँ सदा शिव और उमा रहते हैं और सिद्ध, तपस्वी, योगी, देवता, किन्नर और मुनि सुख के मूल शिव की सेवा करते हैं।
मैँ जाना तुम्हार गुन सीला । कहउँ सुनहु अब रघुपति-लीला ॥
सुनु मुनि आजु समागम तोरें । कहि न जाइ जस सुख मन मोरें ॥
maim̐ jānā tumhāra guna sīlā | kahaum̐ sunahu aba raghupati-līlā ||
sunu muni āju samāgama toreṃ | kahi na jāi jasa sukha mana moreṃ ||
राम चरित अति अमित मुनीसा । कहि न सकहिँ सत कोटि अहीसा ॥
तदपि जथा स्रुत कहउँ बखानी । सुमिरि गिरापति प्रभु धनु-पानी ॥
rāma carita ati amita munīsā | kahi na sakahim̐ sata koṭi ahīsā ||
tadapi jathā sruta kahaum̐ bakhānī | sumiri girāpati prabhu dhanu-pānī ||
सारद दारु-नारि-सम स्वामी । राम-सूत्रधर अन्तरजामी ॥
जेहि पर कृपा करहिँ जन जानी । कबि-उर-अजिर नचावहिँ बानी ॥
sārada dāru-nāri-sama svāmī | rāma-sūtradhara antarajāmī ||
jehi para kṛpā karahim̐ jana jānī | kabi-ura-ajira nacāvahim̐ bānī ||
प्रनवउँ सोइ कृपाल रघुनाथा । बरनउँ बिसद तासु गुन गाथा ॥
परम रम्य गिरिबर कैलासू । सदा जहाँ सिव-उमा निवासू ॥
pranavaum̐ soi kṛpāla raghunāthā | baranaum̐ bisada tāsu guna gāthā ||
parama ramya giribara kailāsū | sadā jahām̐ siva-umā nivāsū ||
सिद्ध तपोधन जोगि जन, सुर किन्नर मुनि बृन्द ।
बसहिँ तहाँ सुकृती सकल, सेवहिँ सिव सुखकन्द ॥
siddha tapodhana jogi jana, sura kinnara muni bṛnda |
basahim̐ tahām̐ sukṛtī sakala, sevahim̐ siva sukhakanda ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0