बालकाण्ड

अध्याय 102: माता से उमा की विदाई

6 श्लोक · 102 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

माता से उमा की विदाई

शम्भु ने सास को समझाया, वे चरणों में सिर नवाकर घर गईं। माता ने उमा को गोद में लेकर सीख दी कि सदा शंकर के चरणों की पूजा करना, नारी का धर्म यही है कि पति ही देवता है, दूसरा नहीं। कहते हुए आँखें भर आईं और पुत्री को छाती से लगा लिया। वे बोलीं, विधाता ने जगत में स्त्री को क्यों रचा? पराधीन को सपने में भी सुख नहीं। कुसमय जानकर उन्होंने धीरज धरा, फिर भी बार बार उमा से मिलती रहीं। सबके आशीर्वाद लेकर भवानी मुड़ मुड़कर माता को देखती चलीं और सखियाँ उन्हें शिव के पास ले गईं। शंकर याचकों को सन्तुष्ट करके उमा सहित चले, फूल बरसे और नगाड़े बजे। हिमवान पहुँचाने चले, वृषकेतु ने उन्हें सन्तुष्ट करके विदा किया।

102.1

बहु बिधि सम्भु सास समुझाई । गवनी भवन चरन सिर नाई ॥
जननीं उमा बोलि तब लीन्ही । लेइ उछङ्ग सुन्दर सिख दीन्ही ॥

bahu bidhi sambhu sāsa samujhāī | gavanī bhavana carana sira nāī ||
jananīṃ umā boli taba līnhī | lei uchaṅga sundara sikha dīnhī ||

102.2

करेहु सदा सङ्कर-पद-पूजा । नारि धरम पति-देव न दूजा ॥
बचन कहत भरे लोचन बारी । बहुरि लाइ उर लीन्हि कुमारी ॥

karehu sadā saṅkara-pada-pūjā | nāri dharama pati-deva na dūjā ||
bacana kahata bhare locana bārī | bahuri lāi ura līnhi kumārī ||

102.3

कत बिधि सृजीं नारि जग माहीँ । पराधीन सपनेहुँ सुख माहीं ॥
भइ अति प्रेम बिकल महँतारी । धीरज कीन्ह कुसमय बिचारी ॥

kata bidhi sṛjīṃ nāri jaga māhīm̐ | parādhīna sapanehum̐ sukha māhīṃ ||
bhai ati prema bikala maham̐tārī | dhīraja kīnha kusamaya bicārī ||

102.4

पुनि पुनि मिलति परति गहि चरना । परम प्रेम कछु जाइ न बरना ॥
सब नारिन्ह मिलि मैँटि भवानी । जाइ जननि उर पुनि लपटानी ॥

puni puni milati parati gahi caranā | parama prema kachu jāi na baranā ||
saba nārinha mili maim̐ṭi bhavānī | jāi janani ura puni lapaṭānī ||

102.छं॰ 1छन्द

जननिहि बहुरि मिलि चली उचित असीस सब काहूँ दईं ।
फिरि फिरि बिलोकति मातु तन तब, सखीं लै सिव पहिँ गई ॥
जाचक सकल सन्तोषि सङ्कर, उमा सहित भवन चले ।
सब अमर हरषे सुमन बरषि निसान नभ बाजे भले ॥

jananihi bahuri mili calī ucita asīsa saba kāhūm̐ daīṃ |
phiri phiri bilokati mātu tana taba, sakhīṃ lai siva pahim̐ gaī ||
jācaka sakala santoṣi saṅkara, umā sahita bhavana cale |
saba amara haraṣe sumana baraṣi nisāna nabha bāje bhale ||

दो॰ 102दोहा

चले सङ्ग हिमवन्त तब, पहुँचावन अति हेतु ।
बिबिध भाँति परितोष करि, बिदा कीन्हि वृषकेतु ॥

cale saṅga himavanta taba, pahum̐cāvana ati hetu |
bibidha bhām̐ti paritoṣa kari, bidā kīnhi vṛṣaketu ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0