बोलि सकल सुर सादर लीन्हे । सबहि जथोचित आसन दीन्हे ॥
बेदी बेद-बिधान सँवारी । सुभग सुमङ्गल गावहिं नारी ॥
boli sakala sura sādara līnhe | sabahi jathocita āsana dīnhe ||
bedī beda-bidhāna sam̐vārī | subhaga sumaṅgala gāvahiṃ nārī ||
6 श्लोक · 100 में से 361
सब देवताओं को आदर से आसन दिए गए और वेदविधि से वेदी सजी। ब्राह्मणों को सिर नवाकर और हृदय में अपने प्रभु रघुराई का स्मरण करके शिव दिव्य सिंहासन पर बैठे। फिर मुनियों ने उमा को बुलाया, सखियाँ श्रृंगार करके उन्हें ले आईं। उनका रूप देखकर सब देवता मोहित हुए और उन्हें जगदम्बिका जानकर मन ही मन प्रणाम किया। जिनकी शोभा कहते वेद, शेष और शारदा भी सकुचाते हैं, उसे मन्दबुद्धि तुलसी क्या कहे? माता भवानी मण्डप के बीच गईं जहाँ शिव थे। संकोच से पति के चरणकमल देख न सकीं, पर मन रूपी भौंरा वहीं था। मुनियों की आज्ञा से शम्भु और भवानी ने गणपति की पूजा की। इस पर कोई संशय न करे, देवताओं को अनादि जाने।
बोलि सकल सुर सादर लीन्हे । सबहि जथोचित आसन दीन्हे ॥
बेदी बेद-बिधान सँवारी । सुभग सुमङ्गल गावहिं नारी ॥
boli sakala sura sādara līnhe | sabahi jathocita āsana dīnhe ||
bedī beda-bidhāna sam̐vārī | subhaga sumaṅgala gāvahiṃ nārī ||
सिंघासनु अति दिब्य सुहावा । जाइ न बरनि बिचित्र बनावा ॥
बैठे सिव बिप्रन्ह सिर नाई । हृदयँ सुमिरि निज प्रभु रघुराई ॥
siṃghāsanu ati dibya suhāvā | jāi na barani bicitra banāvā ||
baiṭhe siva bipranha sira nāī | hṛdayam̐ sumiri nija prabhu raghurāī ||
बहुरि मुनीसन्ह उमा बोलाई । करि सिङ्गार सखीं लेइ आई ॥
देखत रूप सकल सुर मोहे । बरनइ छबि अस जग कबि को हे ॥
bahuri munīsanha umā bolāī | kari siṅgāra sakhīṃ lei āī ||
dekhata rūpa sakala sura mohe | baranai chabi asa jaga kabi ko he ||
जगदम्बिका जानि भव-भामा । सुरन्ह मनहिं मन कीन्ह प्रनामा ॥
सुन्दरता-मरजाद भवानी । जाइ न कोटिहुँ बदन बखानी ॥
jagadambikā jāni bhava-bhāmā | suranha manahiṃ mana kīnha pranāmā ||
sundaratā-marajāda bhavānī | jāi na koṭihum̐ badana bakhānī ||
कोटिहुँ बदन नहिँ बनइ बरनत, जग-जननि-सोभा महा ।
सकुचहिँ कहत श्रुति सेष सारद, मन्द-मति तुलसी कहा ॥
छबि-खानि मातु भवानि गवनी, मध्य मंडप सिव जहाँ ।
अवलोकि सकइ न सकुच पति-पद,-कमल मन मधुकर तहाँ ॥
koṭihum̐ badana nahim̐ banai baranata, jaga-janani-sobhā mahā |
sakucahim̐ kahata śruti seṣa sārada, manda-mati tulasī kahā ||
chabi-khāni mātu bhavāni gavanī, madhya maṃḍapa siva jahām̐ |
avaloki sakai na sakuca pati-pada,-kamala mana madhukara tahām̐ ||
मुनि अनुसासन गनपतिहि, पूजेउ सम्मु-भवानि ।
कोउ सुनि संसय करइ जनि, सुर अनादि जियँ जानि ॥
muni anusāsana ganapatihi, pūjeu sammu-bhavāni |
kou suni saṃsaya karai jani, sura anādi jiyam̐ jāni ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0