श्रीराम कहते हैं, हे तात, आप पिता के समान मेरे हितैषी हैं, हाथ जोड़कर विनती है कि वही करें जिससे पिता हमारे सोच में दुख न पाएँ। यह संवाद सुनकर निषाद परिवार सहित व्याकुल हो गया। फिर लक्ष्मण ने कुछ कड़वी बात कही, प्रभु ने उसे बहुत अनुचित जानकर रोका और सकुचाकर सुमन्त्र को शपथ दिलाई कि लक्ष्मण की बात न कहना। तब सुमन्त्र ने राजा का संदेश कहा कि सीता वन के कष्ट नहीं सह सकेंगी। जैसे भी सीता अवध लौटें, वही रघुबर को और तुम्हें करना है, नहीं तो मैं जल बिना मछली की तरह नहीं जीऊँगा। मायके और ससुराल में सब सुख है, विपत्ति बीतने तक सीता जहाँ चाहें सुख से रहें।