अयोध्याकाण्ड

अध्याय 89: ग्रामवासियों का विस्मय और शिंशपा तले शय्या

5 श्लोक · 89 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

ग्रामवासियों का विस्मय और शिंशपा तले शय्या

राम, लक्ष्मण और सीता का रूप देखकर गाँव के नर नारी प्रेम से आपस में कहते हैं, हे सखी, वे माता पिता कैसे होंगे जिन्होंने ऐसे बालकों को वन भेज दिया। कुछ कहते हैं कि राजा ने अच्छा ही किया, इसी से विधाता ने हमें नेत्रों का लाभ दिया। तब निषादपति ने शिंशपा का एक सुन्दर वृक्ष चुना और रघुनाथ को वह स्थान दिखाया, राम ने कहा कि यह सब प्रकार से सुहावना है। पुरवासी प्रणाम करके घर लौटे और रघुबर संध्या करने गए। गुह ने कुश और कोमल पत्तों की मुलायम साथरी बिछाई, और पवित्र, मीठे, कोमल फल मूल दोनों में भर रखे। सीता, सुमन्त्र और भाई के साथ कन्द मूल फल खाकर रघुवंशमणि सो गए, और लक्ष्मण उनके चरण दबाने लगे।

89.1

राम-लखन-सिय रूप निहारी । कहहिँ सप्रेम ग्राम नर-नारी ॥
ते पितु मातु कहहु सखि कैसे । जिन्ह पठये बन बालक ऐसे ॥

rāma-lakhana-siya rūpa nihārī | kahahim̐ saprema grāma nara-nārī ||
te pitu mātu kahahu sakhi kaise | jinha paṭhaye bana bālaka aise ||

89.2

एक कहहिँ भल भूपति कीन्हा । लोचन लाहु हमहि बिधि दीन्हा ॥
तब निषाद-पति उर अनुमाना । तरु सिंसुपा मनोहर जाना ॥

eka kahahim̐ bhala bhūpati kīnhā | locana lāhu hamahi bidhi dīnhā ||
taba niṣāda-pati ura anumānā | taru siṃsupā manohara jānā ||

89.3

लेइ रघुनाथहि ठाउँ देखावा । कहेउ राम सब भाँति सुहावा ॥
पुरजन करि जोहार घर आये । रघुबर सन्ध्या करन सिधाये ॥

lei raghunāthahi ṭhāum̐ dekhāvā | kaheu rāma saba bhām̐ti suhāvā ||
purajana kari johāra ghara āye | raghubara sandhyā karana sidhāye ||

89.4

गुहँ सँवारि साँथरी डसाई । कुस-किसलयमय-मृदुल सुहाई ॥
सुचि फल मूल मधुर मृदु जानी । दोना अरि भरि राखेसि आनी ॥

guham̐ sam̐vāri sām̐tharī ḍasāī | kusa-kisalayamaya-mṛdula suhāī ||
suci phala mūla madhura mṛdu jānī | donā ari bhari rākhesi ānī ||

दो॰ 89दोहा

सिय सुमन्त्र भ्राता सहित, कन्द मूल फल खाइ ।
सयन कीन्ह रघुबंसमनि, पाय पलोटत भाइ ॥

siya sumantra bhrātā sahita, kanda mūla phala khāi |
sayana kīnha raghubaṃsamani, pāya paloṭata bhāi ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0