अयोध्याकाण्ड

अध्याय 82: सीता के लिए दशरथ का सन्देश, सुमन्त्र चले

5 श्लोक · 82 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

सीता के लिए दशरथ का सन्देश, सुमन्त्र चले

दशरथ कहते हैं, यदि धीर दोनों भाई न लौटें, क्योंकि रघुनाथ सत्यप्रतिज्ञ और दृढ़व्रती हैं, तो हाथ जोड़कर विनती करना कि प्रभु, मिथिलेश की कन्या को लौटा दीजिए। जब सीता वन देखकर डरें, तब अवसर पाकर मेरी सीख कहना। सास ससुर ने यह सन्देश भेजा है, पुत्री, लौट चलो, वन में बहुत क्लेश है। कभी पिता के घर, कभी ससुराल, जहाँ तुम्हारी इच्छा हो, वहीं रहना। यदि वे लौट आईं तो मेरे प्राणों को सहारा होगा। नहीं तो अन्त में मेरा मरण निश्चित है। ऐसा कहकर राजा मूर्छित होकर धरती पर गिर पड़े और बोले, राम, लक्ष्मण और सीता को लाकर दिखाओ। राजाज्ञा पाकर सुमन्त्र ने सिर नवाया, अत्यन्त वेग वाला रथ सजाया और नगर के बाहर वहाँ गए जहाँ सीता सहित दोनों भाई थे।

82.1

जौ नहिँ फिरहिँ धीर दोउ भाई । सत्यसन्ध दृढ़ब्रत रघुराई ॥
तौ तुम्ह बिनय करेहु कर जोरी । फेरिअ प्रभु मिथिलेस-किसोरी ॥

jau nahim̐ phirahim̐ dhīra dou bhāī | satyasandha dṛr̤habrata raghurāī ||
tau tumha binaya karehu kara jorī | pheria prabhu mithilesa-kisorī ||

82.2

जब सिय कानन देखि डेराई । कहेहु मोरि सिख अवसर पाई ॥
सासु ससुर अस कहेउ सँदेसू । पुत्रि फिरिअ बन बहुत कलेसू ॥

jaba siya kānana dekhi ḍerāī | kahehu mori sikha avasara pāī ||
sāsu sasura asa kaheu sam̐desū | putri phiria bana bahuta kalesū ||

82.3

पितु गृह कबहुँ कबहुँ ससुरारी । रहेहु जहाँ रुचि होइ तुम्हारी ॥
एहि बिधि करेहु उपाय कदम्बा । फिरइ त होइ प्रान अवलम्बा ॥

pitu gṛha kabahum̐ kabahum̐ sasurārī | rahehu jahām̐ ruci hoi tumhārī ||
ehi bidhi karehu upāya kadambā | phirai ta hoi prāna avalambā ||

82.4

नाहिँ त मोर मरन परिनामा । कछु न बसाइ भये विधि बामा ॥
अस कहि मुरुछि परा महि राऊ । राम लखन सिय आनि देखाऊ ॥

nāhim̐ ta mora marana parināmā | kachu na basāi bhaye vidhi bāmā ||
asa kahi muruchi parā mahi rāū | rāma lakhana siya āni dekhāū ||

दो॰ 82दोहा

पाइ रजायसु नाइ सिर, रथ अति बेग बनाइ ।
गयउ जहाँ बाहेर नगर, सीय सहित दोउ भाइ ॥

pāi rajāyasu nāi sira, ratha ati bega banāi |
gayau jahām̐ bāhera nagara, sīya sahita dou bhāi ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0