अयोध्याकाण्ड

अध्याय 81: श्रीराम का प्रस्थान, सुमन्त्र को आदेश

5 श्लोक · 81 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

श्रीराम का प्रस्थान, सुमन्त्र को आदेश

इस प्रकार श्रीराम ने सबको समझाया, प्रसन्न होकर गुरु के चरणकमलों में सिर नवाया, गणेश, गौरी और शिव को मनाकर आशीर्वाद पाकर रघुनाथ चले। राम के चलते ही बड़ा विषाद छा गया, नगर का आर्त नाद सुना नहीं जाता। लंका में अपशकुन होने लगे, अवध में अत्यन्त शोक हुआ, और देवलोक हर्ष और विषाद दोनों के वश हो गया। मूर्छा टूटने पर राजा जागे और सुमन्त्र को बुलाकर कहने लगे, राम वन चले गए, पर प्राण नहीं जाते, न जाने किस सुख के लिए शरीर में टिके हैं। फिर धीरज धरकर राजा बोले, सखा, तुम रथ लेकर साथ जाओ। दोनों कुमार अत्यन्त सुकुमार हैं और जनकपुत्री भी सुकुमारी है। उन्हें रथ पर चढ़ाकर वन दिखाकर चार दिन में लौट आना।

81.1

एहि बिधि राम सबहि समुझावा । गुरु-पद-पदुम हरषि सिरु नावा ॥
गनपति गौरि गिरीस मनाई । चले असीस पाइ रघुराई ॥

ehi bidhi rāma sabahi samujhāvā | guru-pada-paduma haraṣi siru nāvā ||
ganapati gauri girīsa manāī | cale asīsa pāi raghurāī ||

81.2

राम चलत अति भयउ बिषादू । सुनि न जाइ पुर आरत नादू ॥
कुसगुन लंक अवध अति सोकू । हहरष-बिषाद बिबस सुरलोकू ॥

rāma calata ati bhayau biṣādū | suni na jāi pura ārata nādū ||
kusaguna laṃka avadha ati sokū | haharaṣa-biṣāda bibasa suralokū ||

81.3

गइ मुरछा तब भूपति जागे । बोलि सुमन्त्र कहन अस लागे ॥
राम चले बन प्रान न जाहीँ । केहि सुख लागि रहत तन माहीं ॥

gai murachā taba bhūpati jāge | boli sumantra kahana asa lāge ||
rāma cale bana prāna na jāhīm̐ | kehi sukha lāgi rahata tana māhīṃ ||

81.4

एहि तें कवन व्यथा बलवाना । जो दुख पाइ तजहिँ तनु प्राना ॥
पुनि धरि धीर कहइ नरनाहू । लेइ रथ सङ्ग सखा तुम्ह जाहू ॥

ehi teṃ kavana vyathā balavānā | jo dukha pāi tajahim̐ tanu prānā ||
puni dhari dhīra kahai naranāhū | lei ratha saṅga sakhā tumha jāhū ||

दो॰ 81दोहा

सुठि सुकुमार कुमार दोउ, जनक-सुता सुकुमारि ।
रथ चढ़ाइ देखराइ बन, फिरेहु गये दिन चारि ॥

suṭhi sukumāra kumāra dou, janaka-sutā sukumāri |
ratha car̤hāi dekharāi bana, phirehu gaye dina cāri ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0